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साहिब सिंह वर्मा : जब प्याज के दाम और एक बयान ने छीन ली थी दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी

साहिब सिंह वर्मा : जब प्याज के दाम और एक बयान ने छीन ली थी दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी
साहिब सिंह वर्मा : जब प्याज के दाम और एक बयान ने छीन ली थी दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी

नई दिल्ली, 29 जून (आईएएनएस)। 12 अक्टूबर 1998 को दिल्ली के लोगों की भीड़ मुख्यमंत्री आवास के बाहर खड़ी थी और भारी आक्रोश था। 50 दिन बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने थे। उस दौर में महंगी प्याज हर किसी के आंसू निकाल रही थी। विपक्ष में बैठी कांग्रेस को बिना मेहनत किए ही एक हथियार मिल चुका था। सड़क पर प्रदर्शन हो रहे थे और नारेबाजी के बीच मुख्यमंत्री एक सरकारी बस में सवार होकर अपने घर की ओर रवाना हो गए और इसी के साथ उनका मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल समाप्त हो गया। ये कहानी है दिल्ली के चौथे मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा की।

15 मार्च 1943 को दिल्ली के मुंडका गांव में एक किसान जाट परिवार में जन्मे साहिब सिंह वर्मा ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत आरएसएस कार्यकर्ता के तौर पर की थी। उनका सफर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उनकी पढ़ाई-लिखाई से आकार लेने लगा था। कहते हैं कि पढ़ाई के समय एक प्रोफेसर की सलाह पर उन्होंने अपने नाम के आगे 'वर्मा' शब्द जोड़ा था।

पढ़ाई के बाद दिल्ली लौटे और उन्होंने म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की लाइब्रेरी में काम किया। इसी दौरान, दूध-जलेबी के लिए मशहूर एक मिठाई की दुकान पर उनकी मुलाकात अटल बिहारी वाजपेयी समेत जनसंघ के कई बड़े नेताओं से हुई। उनकी सोच से प्रेरित होकर साहिब सिंह वर्मा आरएसएस और बाद में भाजपा में शामिल हो गए।

वे जनता पार्टी के टिकट पर दिल्ली नगर निगम के लिए चुने गए थे। 1983 में वे भाजपा के टिकट पर फिर से चुने गए। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद 1993 में साहिब सिंह को दिल्ली सरकार में शिक्षा और विकास मंत्री बनाया गया।

उनके करियर में अहम मोड़ 1996 में आया, जब जैन हवाला मामले में लगे आरोपों के कारण मदन लाल खुराना को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। विचार-विमर्श के बाद भाजपा विधायक दल ने साहिब सिंह वर्मा को नया मुख्यमंत्री चुना। वे 1996 में दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और ढाई साल से भी अधिक समय तक इस पद पर रहे। वर्मा का यह कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा।

वजीराबाद में स्कूल बस हादसा और उपहार सिनेमाघर जैसी कुछ बड़ी त्रासदी ने दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा के सामने और चुनौतियों को खड़ा किया था। फिर मिलावटी सरसों के तेल के सेवन से 'ड्रॉप्सी' बीमारी का बड़ा प्रकोप फैला था। इस गंभीर खाद्य मिलावट संकट और स्वास्थ्य आपातकाल के प्रबंधन को लेकर उनकी सरकार पर सवाल उठे थे। चुनौतियों से वे जूझ ही रहे थे कि विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले प्याज की बढ़ती कीमतों के खिलाफ जनता में आक्रोश पनप चुका था।

"गरीब आदमी किसी हालत में प्याज नहीं खाता", यह वो शब्द थे, जो साल 1998 के आखिरी कुछ महीनों में साहिब सिंह वर्मा की प्रेस वार्ता में सुनाई पड़े थे।

वर्मा को यह बयान बहुत भारी पड़ चुका था। प्रेस वार्ता के अगले दिन उनकी टिप्पणी अखबारों की सुर्खियां बन चुकी थी। कहा जाता है कि इस बयान ने जनता के बीच चिंगारी का काम किया और साहिब सिंह वर्मा की कुर्सी चली गई। वर्मा ने मुख्यमंत्री आवास से डीटीसी बस में निकलकर अपने इस्तीफे को नाटकीय रूप दिया था। बाद में उनकी जगह सुषमा स्वराज को दिल्ली की कुर्सी सौंपी गई थी।

हालांकि, दिल्ली की राजनीति के लिए 30 जून 2007 का दिन बेहद दुखद था। साहिब सिंह वर्मा उस दिन कार से जा रहे थे। जयपुर-दिल्ली हाईवे पर शाहजहांपुर में उनकी कार एक ट्रक से टकरा गई, जिससे उनका निधन हो गया।

--आईएएनएस

डीसीएच/एबीएम

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