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सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट का याचिकाकर्ता से सवाल, क्यों दे रहे हो धार्मिक मामलों में दखल

नई दिल्ली, 5 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान मूल याचिकाकर्ता से तीखे सवाल किए। अदालत ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता देश के मुख्य पुजारी हैं, जो इस तरह के धार्मिक मुद्दे को लेकर कोर्ट पहुंचे हैं।
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट का याचिकाकर्ता से सवाल, क्यों दे रहे हो धार्मिक मामलों में दखल

नई दिल्ली, 5 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान मूल याचिकाकर्ता से तीखे सवाल किए। अदालत ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता देश के मुख्य पुजारी हैं, जो इस तरह के धार्मिक मुद्दे को लेकर कोर्ट पहुंचे हैं।

यह मामला सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पारंपरिक रोक को चुनौती देने से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिका दाखिल करने वाली संस्था इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन से याचिका दाखिल के औचित्य पर सवाल उठाए।

संविधान पीठ ने कहा कि इस तरह की जनहित याचिका कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होती है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता संस्था को वकीलों के हित और उनके कल्याण के लिए काम करना चाहिए, न कि इस प्रकार के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए।

पीठ की सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आजकल पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन प्राइवेट, पैसा और पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन बनती जा रही है।

दरअसल, इसी संस्था ने वर्ष 2006 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती दी थी। बाद में 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी। इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन पर अब सुनवाई जारी है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने मंदिर के पुजारी की उस दलील पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि भगवान अयप्पा को युवा महिलाएं पसंद नहीं हैं। वकील ने इसे भगवान का अपमान बताते हुए पूछा कि क्या ऐसी बात को आस्था कहा जा सकता है।

इस पर अदालत ने फिर सवाल उठाया कि एक वकीलों का संगठन ऐसे धार्मिक मामलों में क्यों हस्तक्षेप कर रहा है। जवाब में वकील ने कहा कि उनकी मुवक्किल पहले एक महिला हैं और फिर हिंदू और इस तरह के बयान से उनकी पहचान को ठेस पहुंचती है।

जस्टिस नागरत्ना ने नाराजगी जताते हुए कहा कि संस्था को युवा और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले प्रतिभाशाली वकीलों की मदद करनी चाहिए, बजाय इस तरह की याचिकाएं दाखिल करने के।

सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने यह भी पूछा कि क्या इस याचिका को दाखिल करने के लिए संस्था ने कोई आधिकारिक निर्णय लिया था और क्या इसके अध्यक्ष ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। वकील ने बताया कि संस्था रजिस्टर्ड है, लेकिन उनकी जानकारी में कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था।

एक अन्य जज ने भी कहा कि इस प्रकार की जनहित याचिकाओं से बचना चाहिए, क्योंकि ये न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकती हैं।

--आईएएनएस

एएमटी/वीसी

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