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रुद्रप्रयाग के कुमड़ी गांव में विराजती हैं मां कूष्मांडा, जानें प्राचीन मंदिर का महत्व

उत्तराखंड, 28 मार्च (आईएएनएस)। देवभूमि, उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास माना जाता है। इसी पवित्र भूमि में रुद्रप्रयाग जनपद के कुमड़ी गांव में मां कूष्मांडा का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर अपनी प्राकृतिक खूबसबरती और आध्यात्मिक शक्ति के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
रुद्रप्रयाग के कुमड़ी गांव में विराजती हैं मां कूष्मांडा, जानें प्राचीन मंदिर का महत्व

उत्तराखंड, 28 मार्च (आईएएनएस)। देवभूमि, उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास माना जाता है। इसी पवित्र भूमि में रुद्रप्रयाग जनपद के कुमड़ी गांव में मां कूष्मांडा का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर अपनी प्राकृतिक खूबसबरती और आध्यात्मिक शक्ति के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है।

मां कूष्मांडा नवदुर्गा का चौथा स्वरूप हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार व्याप्त था, तब मां ने अपनी मंद मुस्कान (कुत्सित ऊष्मा) से ब्रह्मांड की रचना की थी।

यह मंदिर एक सिद्धपीठ है, जहां देवी पिंडी के रूप में विराजमान हैं और इसका मुख्य आकर्षण देवी की अष्टधातु से बनी अष्टभुजा वाली प्राचीन मूर्ति है। भक्तों का विश्वास है कि यहां दर्शन करने से मन की शांति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शनिवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के महत्व पर कुछ बातें कीं।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का खास वीडियो पोस्ट किया। इसके साथ उन्होंने लिखा, "रुद्रप्रयाग जनपद के कुमड़ी गांव में मां कूष्मांडा का प्राचीन और अत्यंत पावन मंदिर स्थित है। यहां देवी की अष्टधातु से निर्मित अष्टभुजा स्वरूप की प्राचीन मूर्ति स्थापित है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। आप भी रुद्रप्रयाग आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"

मंदिर के आसपास का वातावरण शांत और प्राकृतिक है, जो श्रद्धालुओं को और आकर्षित करता है। पर्यटक और श्रद्धालु यहां आकर प्राकृतिक सुंदरता का भी आनंद ले सकते हैं।

यह मंदिर सिद्धपीठों में से एक है, जहां देवी मां पिंडी रूप में दो मुख के साथ विराजमान हैं, जो लेटी हुई प्रतीत होती हैं। इसकी विशेषता ये है कि यहां पर जल रिसता है, जिसे एक तरह की औषधीय माना जाता है। मान्यता है कि इस जल को 6 महीने तक आँखों में लगाने से खोई हुई रोशनी वापस आ सकती है।

सदियों से चली आ रही मंदिर की एक विशेष परंपरा के अनुसार, यहां ब्राह्मणों के बजाय मलिन समुदाय के लोग पूजा, शृंगार और भोग की परंपरा निभाते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां विशेष अनुष्ठान और तीन दिवसीय महायज्ञ आयोजित किया जाता है।

इस मंदिर की सदियों पुरानी विशिष्ट परंपरा के अनुसार, यहां पूजन, शृंगार और भोग की जिम्मेदारी 'वंचित समाज' के लोग निभाते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां विशेष अनुष्ठान और तीन दिवसीय महायज्ञ का भव्य आयोजन किया जाता है।"

--आईएएनएस

एनएस/एएस

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