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'राइट टू स्पोर्ट्स' को मौलिक अधिकार बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, याचिकाकर्ता ने 'फिजिकल लिटरेसी' का विरोध किया

'राइट टू स्पोर्ट्स' को मौलिक अधिकार बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, याचिकाकर्ता ने 'फिजिकल लिटरेसी' का विरोध किया
'राइट टू स्पोर्ट्स' को मौलिक अधिकार बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, याचिकाकर्ता ने 'फिजिकल लिटरेसी' का विरोध किया

नई दिल्ली, 20 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत 'खेल के अधिकार' को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता देने की मांग वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता डॉ. कनिष्क पांडे ने कोर्ट से आग्रह किया कि खेल तक पहुंच से जुड़े बड़े संवैधानिक सवाल को 'फिजिकल लिटरेसी' जैसी सीमित अवधारणा में न बदला जाए।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, "यह एक सराहनीय मांग है। यह बेहद जरूरी है। अब इस डिजिटल युग में, बच्चे खेल के मैदानों से पूरी तरह दूर होते जा रहे हैं।"

कनिष्क पांडे की तरफ से दायर इस जनहित याचिका में खेल को संवैधानिक मान्यता देने की मांग की गई है। इसका आधार यह है कि बच्चों और नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए खेलों में भागीदारी जरूरी है और इसे सिर्फ व्यक्तिगत विशेषाधिकार, संस्थागत मर्जी या प्रतिस्पर्धी उत्कृष्टता तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।

याचिका दायर होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की सहायता के लिए एक 'एमिकस क्यूरी' (न्याय मित्र) नियुक्त किया। बाद में कोर्ट के सामने एक रिपोर्ट पेश की गई। हालांकि, याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट के कुछ अहम पहलुओं पर आपत्ति जताई, खासकर 'खेल' की व्यापक अवधारणा के बजाय 'फिजिकल लिटरेसी' पर इसके फोकस को लेकर।

याचिकाकर्ता ने कहा कि खेल, शारीरिक शिक्षा और फिजिकल लिटरेसी तीन अलग-अलग अवधारणाएं हैं और उन्हें एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि 'खेल के अधिकार' की जगह 'फिजिकल लिटरेसी' को लाने से याचिका का मूल उद्देश्य और दायरा बदल जाएगा।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि खेलों को मुख्य रूप से बेहतरीन प्रदर्शन, मेडल, प्रतियोगिता और खेल में सफलता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

याचिका के अनुसार, खेल का एक व्यापक सामाजिक और विकासात्मक पहलू है। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास, अनुशासन, नेतृत्व, आत्मविश्वास, मुश्किलों से उबरने की क्षमता, टीम वर्क और चरित्र निर्माण में योगदान दे सकता है। यह तनाव, नकारात्मकता और सामाजिक अलगाव को दूर करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है, साथ ही मजबूत समुदाय बनाने और सामाजिक मेलजोल, समावेश और एकजुटता को बढ़ावा दे सकता है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि इसलिए खेल शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, युवा विकास, सामुदायिक निर्माण, सामाजिक विकास और राष्ट्र निर्माण के साधन के तौर पर एक साथ काम कर सकता है।

कनिष्क पांडे ने कोर्ट से कहा कि इतने बड़े संवैधानिक महत्व वाले मामले पर सिफारिशों तक पहुंचने से पहले, खेल को पूरी तरह से समझना और उसके कई पहलुओं की जांच करना अनिवार्य है।

उन्होंने कहा, "इस पीआईएल का मकसद कभी भी सिर्फ चैंपियन बनाना या मेडल जीतना नहीं रहा है। खेल का दायरा प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठता से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह लोगों को बेहतर बनाता है, समुदायों को मजबूत करता है और शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास में योगदान देता है। फिजिकल लिटरेसी (शारीरिक साक्षरता), फिजिकल एजुकेशन (शारीरिक शिक्षा) और खेल एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते। अदालत के सामने हमारा विनम्र निवेदन है कि खेल की संवैधानिक स्थिति तय करने से पहले, हमें खेल को उसके पूरे सामाजिक, शैक्षिक और विकासात्मक संदर्भ में समझना होगा।"

कनिष्क पांडे का मानना है कि जैसे-जैसे बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर स्क्रीन की ओर बढ़ रहे हैं, खेल तक पहुंच को मान्यता देना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा, "ऐसे समय में जब बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर स्क्रीन की ओर बढ़ रहे हैं, खेल तक पहुंच को मान्यता देना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 'खेल के अधिकार' का असल मकसद यह सुनिश्चित करना है कि खेलने का मौका सिर्फ कुछ खास लोगों तक ही सीमित न रहे।"

इस पीआईएल का मकसद बच्चों और युवा नागरिकों के विकास के लिए शिक्षा के साथ-साथ खेल को भी एक जरूरी तत्व के तौर पर स्थापित करने के लिए एक बड़ी राष्ट्रीय बातचीत शुरू करना है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

--आईएएनएस

आरएसजी/एबीएम

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