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राजस्थान के इस शिव मंदिर में शिवलिंग पर शीश चढ़ाते हैं रावण, 500 साल पुरानी है अनोखी प्रतिमा

राजस्थान अपनी अनोखी लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। आमतौर पर दशहरे के दिन भगवान राम की विजय के प्रतीक के रूप में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। लेकिन राजस्थान में एक ऐसी जगह भी है, जहां रावण को बुराई का प्रतीक मानकर उसका दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है।  राजस्थान के जोधपुर जिले के मंडोर क्षेत्र से रावण पूजा की परंपरा जुड़ी हुई बताई जाती है। यहां रावण को लेकर स्थानीय मान्यताएं आम धारणा से अलग हैं। कुछ समुदाय रावण को अपने कुल और परंपरा से जोड़कर देखते हैं और दशहरे के अवसर पर उसकी पूजा करते हैं।  रावण को मानते हैं विद्वान और शिव भक्त स्थानीय मान्यताओं के अनुसार रावण केवल लंका का राजा ही नहीं था, बल्कि वह महान विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त भी था। रावण को वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता तथा संगीत का जानकार माना जाता है। इसी कारण कुछ समुदाय उसके व्यक्तित्व के इन पहलुओं को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।  जोधपुर से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि रावण का विवाह मंडोर की राजकुमारी मंदोदरी से हुआ था। इसी वजह से कुछ स्थानीय लोग रावण को अपनी ऐतिहासिक और पारिवारिक परंपरा से जोड़ते हैं।  दशहरे पर नहीं होता रावण दहन जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं रावण को पूजनीय मानने वाले समुदायों में इस दिन अलग तरह की परंपरा देखने को मिलती है। लोग रावण की प्रतिमा या मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं और उसके विद्वान तथा शिव भक्त स्वरूप को याद करते हैं।  हालांकि, यह परंपरा पूरे राजस्थान में नहीं है। यह कुछ विशेष स्थानीय समुदायों और क्षेत्रों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है।  राजस्थान में ही क्यों अलग है परंपरा? राजस्थान में अलग-अलग क्षेत्रों की लोक संस्कृति और परंपराओं में काफी विविधता है। यहां किसी ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र को लेकर स्थानीय मान्यताएं व्यापक धार्मिक परंपरा से अलग हो सकती हैं। रावण पूजा भी ऐसी ही लोक परंपराओं का उदाहरण है।  रावण को लेकर धार्मिक ग्रंथों में उसके कई रूपों का वर्णन मिलता है। एक ओर वह रामायण का प्रमुख प्रतिपक्षी है, वहीं दूसरी ओर उसे शिव का भक्त, विद्वान और शक्तिशाली राजा भी बताया गया है। स्थानीय परंपराओं में इसी दूसरे पक्ष को अधिक महत्व दिया जाता है।  आस्था और परंपरा का अनोखा मेल रावण की पूजा की यह परंपरा भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाती है। यहां एक ही पात्र को अलग-अलग समुदाय अपनी मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार अलग नजरिए से देखते हैं।  इसलिए राजस्थान में रावण पूजा को केवल ‘अजीब प्रथा’ के तौर पर देखने के बजाय स्थानीय इतिहास, लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। दशहरे के दौरान जहां अधिकांश स्थानों पर रावण दहन होता है, वहीं कुछ जगहों पर उसकी पूजा की परंपरा आज भी लोगों की आस्था का हिस्सा बनी हुई है।

राजस्थान अपनी अनोखी लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। आमतौर पर दशहरे के दिन भगवान राम की विजय के प्रतीक के रूप में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। लेकिन राजस्थान में एक ऐसी जगह भी है, जहां रावण को बुराई का प्रतीक मानकर उसका दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है।

राजस्थान के जोधपुर जिले के मंडोर क्षेत्र से रावण पूजा की परंपरा जुड़ी हुई बताई जाती है। यहां रावण को लेकर स्थानीय मान्यताएं आम धारणा से अलग हैं। कुछ समुदाय रावण को अपने कुल और परंपरा से जोड़कर देखते हैं और दशहरे के अवसर पर उसकी पूजा करते हैं।

रावण को मानते हैं विद्वान और शिव भक्त

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार रावण केवल लंका का राजा ही नहीं था, बल्कि वह महान विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त भी था। रावण को वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता तथा संगीत का जानकार माना जाता है। इसी कारण कुछ समुदाय उसके व्यक्तित्व के इन पहलुओं को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।

जोधपुर से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि रावण का विवाह मंडोर की राजकुमारी मंदोदरी से हुआ था। इसी वजह से कुछ स्थानीय लोग रावण को अपनी ऐतिहासिक और पारिवारिक परंपरा से जोड़ते हैं।

दशहरे पर नहीं होता रावण दहन

जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं रावण को पूजनीय मानने वाले समुदायों में इस दिन अलग तरह की परंपरा देखने को मिलती है। लोग रावण की प्रतिमा या मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं और उसके विद्वान तथा शिव भक्त स्वरूप को याद करते हैं।

हालांकि, यह परंपरा पूरे राजस्थान में नहीं है। यह कुछ विशेष स्थानीय समुदायों और क्षेत्रों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है।

राजस्थान में ही क्यों अलग है परंपरा?

राजस्थान में अलग-अलग क्षेत्रों की लोक संस्कृति और परंपराओं में काफी विविधता है। यहां किसी ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र को लेकर स्थानीय मान्यताएं व्यापक धार्मिक परंपरा से अलग हो सकती हैं। रावण पूजा भी ऐसी ही लोक परंपराओं का उदाहरण है।

रावण को लेकर धार्मिक ग्रंथों में उसके कई रूपों का वर्णन मिलता है। एक ओर वह रामायण का प्रमुख प्रतिपक्षी है, वहीं दूसरी ओर उसे शिव का भक्त, विद्वान और शक्तिशाली राजा भी बताया गया है। स्थानीय परंपराओं में इसी दूसरे पक्ष को अधिक महत्व दिया जाता है।

आस्था और परंपरा का अनोखा मेल

रावण की पूजा की यह परंपरा भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाती है। यहां एक ही पात्र को अलग-अलग समुदाय अपनी मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार अलग नजरिए से देखते हैं।

इसलिए राजस्थान में रावण पूजा को केवल ‘अजीब प्रथा’ के तौर पर देखने के बजाय स्थानीय इतिहास, लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में समझना अधिक उचित है। दशहरे के दौरान जहां अधिकांश स्थानों पर रावण दहन होता है, वहीं कुछ जगहों पर उसकी पूजा की परंपरा आज भी लोगों की आस्था का हिस्सा बनी हुई है।

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