रामनगर के तीन भाइयों की कोशिश: पारंपरिक वाद्य यंत्रों से नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे पहाड़ की संस्कृति
रामनगर, 30 सितंबर (आईएएनएस)। सोशल मीडिया पर आजकल एक तरफ ट्रेंडिंग गानों और आधुनिक संगीत का बोलबाला है तो वहीं नैनीताल जिले के रामनगर के तीन युवा अपनी लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। हारमोनियम, तबला, ढोलकी और हुड़के जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ कुमाऊंनी गीतों की प्रस्तुतियां देने वाले सुयश सती, हर्षित सती और प्रांजल सती इन दिनों सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहे हैं।
खास बात यह है कि तीनों एक ही परिवार से जुड़े हैं और पढ़ाई के साथ संगीत को भी समय दे रहे हैं। उनका उद्देश्य कुमाऊंनी लोकगीतों और उत्तराखंड की संस्कृति को केवल पहाड़ तक सीमित न रखकर सोशल मीडिया के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
रामनगर निवासी सुयश सती वर्तमान में बीटेक की पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, हर्षित सती इंटरमीडिएट के छात्र हैं, जबकि प्रांजल सती संस्कृत विद्यालय से इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहे हैं। सुयश और हर्षित सगे भाई हैं, जबकि प्रांजल उनके ताऊजी के बेटे हैं।
तीनों ने रामनगर के स्वर साधना संगीत विद्यालय में मोहन पाठक से संगीत की शिक्षा ली है। सुयश हारमोनियम बजाते हैं, हर्षित ढोलकी और तबला बजाते हैं, जबकि प्रांजल हुड़का वादन करते हैं। वाद्य यंत्रों के तालमेल के साथ उनकी कुमाऊंनी गीतों की प्रस्तुतियां लोक संगीत की अलग छाप छोड़ती हैं।
सुयश सती ने बताया कि बचपन से ही उनकी इच्छा अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की रही है। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने भाइयों के साथ एक ग्रुप बनाया और सोशल मीडिया पर रील के जरिए कुमाऊं की संस्कृति को लोगों तक पहुंचाने की शुरुआत की।
सुयश ने कहा कि पिछले करीब एक महीने से वे इस तरह की प्रस्तुतियां सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं और लोगों से उन्हें प्यार मिल रहा है। उन्होंने बताया कि उन्होंने पहाड़ी गाने यूट्यूब के माध्यम से सीखे और प्रयास करते हुए अपनी प्रस्तुतियों को तैयार किया।
ढोलकी और तबला वादक हर्षित सती ने बताया कि उन्होंने ढोलक और तबला की विद्या स्वर साधना संगीत महाविद्यालय से सीखी है। उन्होंने बताया कि उनकी कोशिश है कि लोग अपनी संस्कृति को याद रखें और उसे भूले न। इसी उद्देश्य से तीनों मिलकर टीम के रूप में प्रस्तुतियां देते हैं।
वहीं, हुड़का वादक प्रांजल सती ने कहा कि उत्तराखंड की विलुप्त होती संस्कृति को फिर से सामने लाने का उनका प्रयास है। उनके दोनों भाई भी इस प्रयास में साथ देते हैं। आज की पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूर हो रही है और उनका प्रयास है कि युवा अपनी संस्कृति को याद रखें।
तीनों युवाओं की अलग-अलग पारिवारिक परिस्थितियां हैं, लेकिन संगीत के प्रति उनका जुनून एक जैसा है। सुयश और हर्षित के पिता धीरज सती निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और उनकी मां हेमा सती निजी शिक्षिका हैं। वहीं, प्रांजल के पिता प्रकाश सती चाय की दुकान चलाते हैं और उनकी मां गृहिणी हैं। परिवार की जिम्मेदारियों और पढ़ाई के बीच समय निकालकर तीनों संगीत का अभ्यास कर रहे हैं। उनकी प्रस्तुतियों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ कुमाऊंनी गीतों की झलक देखने को मिलती है।
रामनगर के इन तीन युवाओं की संगीत यात्रा अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की उनकी कोशिश को स्थानीय स्तर पर सराहना मिल रही है। अब उनकी कोशिश है कि पढ़ाई के साथ संगीत को आगे बढ़ाते हुए कुमाऊंनी लोकगीतों और उत्तराखंड की पारंपरिक धुनों को और अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए।
--आईएएनएस
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