राम मंदिर चंदा चोरी मामले पर घमासान: विपक्ष ने लगाए गंभीर आरोप, भाजपा ने किया बचाव
नई दिल्ली, 27 जून (आईएएनएस)। राम मंदिर चंदा मामले को लेकर सियासी बयानबाजी जारी है। एक तरफ विपक्ष सरकार और ट्रस्ट प्रबंधन पर सवाल उठा रहा है। दूसरी तरफ, भाजपा नेताओं का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। इस बीच पूर्व पुलिस अधिकारियों ने भी जांच प्रक्रिया और एफआईआर को लेकर अपनी राय रखी है।
पूर्व विधान परिषद सदस्य दीपक सिंह ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार दोषियों को बचाने का प्रयास कर रही है और जांच प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही एसआईटी काम करने लगी थी। चोरी के मामले में केवल 80 लाख रुपए की बरामदगी दिखाई गई, जबकि कथित तौर पर इससे कहीं अधिक राशि की हेराफेरी हुई है।
उन्होंने कहा कि इतिहास में हमने पढ़ा कि मुगलों और अंग्रेजों ने किस तरह देश को लूटा था, लेकिन अब इतिहास यह भी दर्ज करेगा कि भाजपा सरकार के दौरान प्रभु श्रीराम के मंदिर में चोरी और लूट के आरोप सामने आए। दुख की बात यह है कि जहां पहले ऐसे मामलों में दोषियों को सजा दी जाती थी, वहीं अब उन्हें बचाने के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मामले में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर पूरे मामले के बड़े आरोपियों को बचाने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा के राज्यसभा सांसद बृजलाल ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि जिन राजनीतिक दलों ने भगवान राम के अस्तित्व तक पर सवाल उठाए थे। उन्हें राम मंदिर के मुद्दे पर टिप्पणी करने का नैतिक अधिकार नहीं है। कांग्रेस, सपा, आप और वामपंथी दल लगातार राम मंदिर को लेकर राजनीति कर रहे हैं, जिन लोगों ने कभी भगवान राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया, वे आज मंदिर प्रबंधन पर सवाल उठा रहे हैं। मामले की जांच ट्रस्ट की मांग पर ही शुरू हुई थी। इसके बाद एसआईटी का गठन किया गया, जांच हुई और गिरफ्तारियां भी हुई हैं। जांच के बाद सच्चाई सामने आएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे ने मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग करते हुए कहा कि मंदिरों का संचालन ऐसे लोगों के हाथों में होना चाहिए, जो पूरी तरह धार्मिक और नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित हों। ट्रस्ट के पदाधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे वित्तीय गतिविधियों पर नजर रखें और किसी भी अनियमितता को समय रहते रोकें। यह विश्वास करना मुश्किल है कि इतनी बड़ी कथित वित्तीय गड़बड़ी हो जाए और ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों को इसकी जानकारी न हो। जब विपक्ष ने इस मुद्दे को उठाया, तब जाकर मामला सामने आया। उन्होंने कुछ दानदाताओं द्वारा दिए गए योगदान और उनसे संबंधित दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठाए तथा कहा कि पूरे मामले की गहन जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विक्रम सिंह ने मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर कानूनी दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि एफआईआर का संक्षिप्त होना अपने आप में कोई कमजोरी नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि एफआईआर किसी विश्वकोश की तरह विस्तृत दस्तावेज नहीं होती। उसका उद्देश्य केवल अपराध की प्रारंभिक सूचना दर्ज करना होता है। जितने अधिक तथ्य एफआईआर में होंगे, वह उतनी मजबूत हो सकती है, लेकिन साथ ही त्रुटियों की संभावना भी बढ़ जाती है। कई बार जांच एजेंसियां कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए एफआईआर को संक्षिप्त रखती हैं।
पूर्व डीजीपी ने बताया कि एफआईआर में जिन आठ लोगों के नाम दर्ज हैं, उनके अलावा जांच के दौरान जिन अन्य लोगों की भूमिका सामने आएगी, उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल नामजद आरोपियों तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रहती, बल्कि विवेचना में सामने आने वाले अन्य व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया जा सकता है।
--आईएएनएस
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