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राजेंद्र यादव: एक हादसे ने छीन ली रफ्तार, फिर कलम से लिखी अपनी तकदीर

राजेंद्र यादव: एक हादसे ने छीन ली रफ्तार, फिर कलम से लिखी अपनी तकदीर
राजेंद्र यादव: एक हादसे ने छीन ली रफ्तार, फिर कलम से लिखी अपनी तकदीर

नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। आधुनिक हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कथाकार, उपन्यासकार और विचारक राजेंद्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉ. मिश्रीलाल यादव और मां का नाम ताराबाई था। राजेंद्र ने अपनी पढ़ाई-लिखाई आगरा से पूरी की। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए (मास्टर ऑफ आर्ट्स) किया। राजेंद्र शुरू से ही पढ़ाई में काफी होशियार थे, हालांकि बचपन में हुई एक घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

दरअसल, बचपन में हॉकी खेलते वक्त हुए एक हादसे में उनकी एक टांग टूट गई और वह जीवनभर के लिए अपाहिज हो गए। इस घटना के बाद अगर एक आम बच्चा होता, तो वह शायद अपने भविष्य के बारे में सोचकर हताश और निराश हो जाता, लेकिन छोटे राजेंद्र ने अपने आप पर भरोसा रखते हुए, जीवन में कुछ कर दिखाने का फैसला लिया।

राजेंद्र यादव को हिंदी साहित्य में 'नई कहानी' आंदोलन के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। 'सारा आकाश' उनके द्वारा लिखा हुआ पहला और सबसे चर्चित उपन्यास था। इस पर 1969 में हिंदी और बंगाली फिल्म निर्देशक बासु चटर्जी ने इसी नाम से फिल्म बनाई थी।

जब हिंदी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो रही थीं, ऐसे समय में उन्होंने 'हंस', जिसे 1930 में प्रेमचंद ने शुरू किया था, को फिर से जीवित किया और अंत तक इसके संपादक रहे। 1959 में उन्होंने जानी-मानी लेखिका मन्नू भंडारी से शादी की। इस दंपति की एक बेटी थी।

उनके कुछ प्रमुख उपन्यास की बात करें तो उनमें 'सारा आकाश', 'उखड़े हुए लोग', 'कुलटा', 'शह और मात', 'एक इंच मुस्कान', 'अनदेखे अनजान पुल', 'मंत्रविद्ध' आदि हैं। उनके द्वारा लिखी गई कुछ प्रमुख कहानियों में 'देवताओं की मूर्तियां', 'जहां लक्ष्मी कैद है', 'खिलौने', 'छोटे-छोटे ताजमहल', 'मुड़ मुड़ के देखता हूं', 'किनारे से किनारे तक' आदि शामिल हैं।

राजेंद्र यादव का निधन 27 अक्टूबर 2013 को 84 वर्ष की आयु में दिल्ली में हुआ, लेकिन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे।

--आईएएनएस

डीके/वीसी

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