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राजस्थान की विरासत: नवल सागर झील के बीच मंदिर और ऐतिहासिक हवेलियों का अद्भुत संगम

नई दिल्ली, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां झीलें, पहाड़, ऐतिहासिक महल और प्राचीन मंदिर अपने आप में अनूठी सुंदरता समेटे हुए हैं। इन्हीं में से राजस्थान राज्य अपनी समृद्ध विरासत और स्थापत्य कला के लिए विशेष पहचान रखता है। राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित एक कृत्रिम झील इस विरासत का बेहतरीन उदाहरण है, जो अपनी अनोखी बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण पर्यटकों को आकर्षित करती है।
राजस्थान की विरासत: नवल सागर झील के बीच मंदिर और ऐतिहासिक हवेलियों का अद्भुत संगम

नई दिल्ली, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां झीलें, पहाड़, ऐतिहासिक महल और प्राचीन मंदिर अपने आप में अनूठी सुंदरता समेटे हुए हैं। इन्हीं में से राजस्थान राज्य अपनी समृद्ध विरासत और स्थापत्य कला के लिए विशेष पहचान रखता है। राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित एक कृत्रिम झील इस विरासत का बेहतरीन उदाहरण है, जो अपनी अनोखी बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण पर्यटकों को आकर्षित करती है।

इस झील की सबसे खास बात यह है कि इसके बीचों-बीच आधा डूबा हुआ वरुण देव का प्राचीन मंदिर स्थित है। इसके साथ ही झील में एक गोलाकार चबूतरा भी मौजूद है, जो पानी के बीच तैरता हुआ प्रतीत होता है और इस स्थान की खूबसूरती को और बढ़ा देता है।

राजस्थान के बूंदी शहर में स्थित नवल सागर झील अपनी अनोखी सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जानी जाती है। इस झील की सबसे बड़ी खासियत बीच में बना भगवान वरुण देव का मंदिर है, जो आधा पानी में डूबा हुआ नजर आता है। मंदिर के चारों ओर एक गोलाकार चबूतरा बना हुआ है, जो पानी पर तैरता हुआ प्रतीत होता है। यह दृश्य देखने वाले को हैरान कर देता है।

वरुण देवता हिंदू धर्म में जल, समुद्र और आकाशीय नियमों के देवता माने जाते हैं। वे सत्य, न्याय के रक्षक भी माने जाते हैं। सर्वप्रथम ऋग्वेद में उनके बारे में उल्लेख व विशेष महत्व के बारे में बताया गया है। वरुण देव को पापों को क्षमा करने वाला व नैतिक संतुलन बनाए रखने वाला देवता भी माना गया है। झील के बीच बने देवालय में श्रद्धालु भक्ति भाव के साथ दर्शन-पूजन को जाते हैं।

नवल सागर एक मानव-निर्मित झील है जिसका निर्माण 16वीं शताब्दी में बूंदी के महाराजा उम्मेद सिंह ने करवाया था। झील आयताकार है। इसकी लंबाई 983 फीट और चौड़ाई 229 फीट है। झील के चारों ओर पुरानी हवेलियां, मंदिर और तारागढ़ किले की भव्य इमारतें बनी हुई हैं, जो इस जगह को और भी आकर्षक बनाती हैं। झील के बीचों-बीच भगवान वरुण (जल के देवता) को समर्पित मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। मंदिर के चारों ओर बना गोलाकार चबूतरा पानी की सतह पर तैरता हुआ दिखाई देता है।

मानसून के दौरान जब झील में पानी बढ़ जाता है, तब यह पूरा नजारा और भी मनमोहक हो जाता है। बारिश की बूंदें झील की सतह पर गिरती हैं और आसपास की इमारतों की परछाइयां पानी में नजर आती हैं। पास ही स्थित तारागढ़ किले से झील का विहंगम दृश्य बेहद खूबसूरत लगता है। झील के किनारे पत्थर की सुंदर नक्काशीदार सीढ़ियां बनी हैं, जिन पर पुरानी कारीगरी के नमूने देखे जा सकते हैं। किनारे पर छोटे-छोटे मंडप भी बने हैं जहां पर्यटक आराम कर सकते हैं। इन मंडपों पर भी बारीक नक्काशी और मूर्तियां बनी हुई हैं।

नवल सागर सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता का केंद्र नहीं है, बल्कि यह बूंदी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी हिस्सा है। स्थानीय लोगों के लिए यह जगह खास महत्व रखती है। बॉलीवुड फिल्मों और टीवी सीरियलों में भी इस झील की खूबसूरती को कई बार दिखाया गया है, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ गई है।

बूंदी घूमने आए पर्यटक नवल सागर पर नाव की सवारी जरूर करते हैं। नाव से झील के बीच बने वरुण देव मंदिर तक जाना रोमांचक अनुभव देता है। तारागढ़ किले की चढ़ाई कर वहां से पूरे शहर और झील का नजारा देखना भी यादगार होता है।

--आईएएनएस

एमटी/वीसी

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