पितृपक्ष : राजस्थान का चमत्कारी पितृ तीर्थ लोहार्गल, जहां सूर्यकुंड में प्राप्त होती है मुक्ति
लोहार्गल, 26 सितंबर (आईएएनएस)। अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित लोहार्गल यानी लोहागढ़ को राजस्थान के प्रमुख पितृ तीर्थों में माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान देशभर से श्रद्धालु यहां अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि लोहार्गल के पवित्र सूर्यकुंड में अस्थि विसर्जन करने से अस्थियां जल में विलीन हो जाती हैं और मृतकों को मुक्ति प्राप्त होती है।
पितृपक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस अवधि में देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों पर पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। लोहार्गल में भी पितृ पक्ष शुरू होते ही श्रद्धालुओं की आवक बढ़ जाती है। लोहार्गल में मुख्य तीन पर्वतों से निकलने वाली सात धाराओं का धार्मिक महत्व बताया जाता है। यहां स्थित सूर्यकुंड को पितृ कर्म के लिए विशेष माना जाता है। यहां श्रद्धालु स्नान करने के बाद अपने पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण और पिंडदान करते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान सूर्य क्षेत्र में तर्पण और पिंडदान करने से पितृ आत्माओं को शांति और शक्ति प्राप्त होती है। इसी आस्था के कारण यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचते हैं।
पौराणिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने लोहार्गल धाम में पितृ तर्पण के साथ प्रायश्चित यज्ञ किया था। मान्यता है कि यज्ञ के बाद उन्होंने यज्ञ वेदी की अग्नि को तीर्थ के जल से शांत किया और अपने पिता महर्षि जमदग्नि की पितृ आत्मा का तर्पण किया। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण लोहार्गल में पितृ तर्पण, पिंडदान और दिवंगत लोगों की अस्थि प्रवाह की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।
यहां के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य के अनुसार, लोहार्गल वह स्थान है जिसकी रक्षा स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं और यहां किए गए श्राद्ध से मोक्ष की प्राप्ति की मान्यता है।
लोहार्गल की धार्मिक मान्यताओं में पांडवों से जुड़ी कथा भी प्रमुख है। ग्रंथों के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने स्वजनों की हत्या के पाप से दुखी थे। भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर वे विभिन्न तीर्थों की यात्रा कर रहे थे। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने उनसे कहा था कि जिस स्थान पर उनके अस्त्र-शस्त्र पानी में गल जाएंगे, वहीं उनका पाप मुक्ति का मनोरथ पूरा होगा।
कहा जाता है कि जब पांडव लोहार्गल पहुंचे और सूर्यकुंड में स्नान किया तो अर्जुन का गांडीव धनुष और भीम की गदा सहित उनके अस्त्र-शस्त्र जल में गल गए। इसके बाद पांडवों को कौरवों के वध के पाप से मुक्ति मिली। इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम लोहार्गल यानी 'जहां लोहा गल जाए' पड़ा बताया जाता है।
लोहार्गल को दिवंगत लोगों की अस्थियों के विसर्जन के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि सूर्यकुंड में अस्थियां विसर्जित करने से वे जल में विलीन हो जाती हैं और मृतक को मुक्ति मिलती है। पितृपक्ष में यहां बड़ी संख्या में लोग अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियां लेकर पहुंचते हैं।
लोहार्गल के आसपास कई प्राचीन धार्मिक स्थल भी बताए जाते हैं। यहां सूर्य मंदिर, वनखंडी जी मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और पांडव गुफा स्थित हैं। कुंड के पास एक विशाल बावड़ी है, जिसे राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में गिना जाता है। करीब चार सौ सीढ़ियां चढ़ने के बाद मालकेतुजी के दर्शन किए जाते हैं।
--आईएएनएस
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