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पीएम की अपीलों पर राहुल गांधी का तीखा हमला, वीडियो में जाने कहा—“ये उपदेश नहीं, नाकामी है”

राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में हीटवेव जैसे हालात हैं। रविवार को चारों राज्यों के 9 शहरों में पारा 44° के पार रहा। राजस्थान का बाड़मेर 46.8° के साथ देश में सबसे गर्म शहर रहा। जैसलमेर में तापमान 46.3° और फलोदी में 46°C पहुंच गया। उत्तराखंड के कई हिस्सों, खासकर पहाड़ी इलाकों में 12 और 13 मई को बारिश और खराब मौसम की आशंका है। गढ़वाल कमिश्नर ने इस दौरान चार धाम यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं से सावधानी बरतने और यात्रा से बचने की अपील की है।

पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक संकट और उसके वैश्विक असर के बीच देश की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने सोमवार को प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा हाल ही में की गई “सात अपीलों” पर तीखा पलटवार किया है। राहुल गांधी ने इन अपीलों को सरकार की “नाकामी” करार देते हुए कहा कि अब देश चलाना प्रधानमंत्री के बस में नहीं रह गया है।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने लिखा कि प्रधानमंत्री ने जनता से जिन बातों की अपील की है, वे सामान्य सुझाव नहीं बल्कि गंभीर स्थिति का संकेत हैं। उन्होंने लिखा, “कल मोदी जी ने जनता से त्याग मांगा। सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम इस्तेमाल करो, खाद और खाने के तेल का उपयोग घटाओ, मेट्रो से चलो, घर से काम करो। ये उपदेश नहीं हैं। ये विफलता हैं।”

राहुल गांधी ने आगे कहा कि पिछले 12 वर्षों में देश की स्थिति ऐसी बना दी गई है कि अब सरकार को लोगों को यह बताना पड़ रहा है कि उन्हें क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं, कहां जाना चाहिए और कहां नहीं। उनके अनुसार यह स्थिति एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की बजाय कमजोर आर्थिक प्रबंधन को दर्शाती है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब सरकार ने वैश्विक ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय तनाव के चलते नागरिकों से ऊर्जा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की अपील की है। सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और अन्य वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दबाव बढ़ रहा है।हालांकि विपक्ष इसे अलग नजरिए से देख रहा है और सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जनता पर व्यक्तिगत जीवनशैली को लेकर दबाव डालना समाधान नहीं है, बल्कि यह नीति-स्तर पर कमजोरी को दर्शाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है, खासकर तब जब वैश्विक संकट के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना हुआ है। सरकार जहां इसे “जनभागीदारी और बचत की अपील” बता रही है, वहीं विपक्ष इसे “नीतिगत असफलता” के रूप में पेश कर रहा है।फिलहाल दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी जारी है और यह मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

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