राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुनाया बचपन का किस्सा, बोलीं- पिता सूखी लकड़ी लेने से पहले जंगल के सामने झुककर मांगते थे माफी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया। सम्मेलन का विषय ‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य’ था। अपने संबोधन के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और प्रकृति के साथ संतुलन की बात करते हुए अपने बचपन की एक याद साझा की।
राष्ट्रपति ने बताया कि उनके बचपन के दिनों में उनके पिता खाना पकाने के लिए पास के जंगल से सूखी लकड़ियां लेकर आते थे। खास बात यह थी कि लकड़ी लेने या काटने से पहले उनके पिता पेड़ के सामने सम्मानपूर्वक सिर झुकाकर माफी मांगते थे। राष्ट्रपति ने इस घटना को याद करते हुए बताया कि उनके परिवार में प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना बचपन से ही मौजूद थी।
जंगल और प्रकृति के प्रति सम्मान की सीख
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने बचपन के इस प्रसंग के जरिए प्रकृति और इंसान के बीच संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता जंगल से केवल जरूरत के अनुसार सूखी लकड़ियां लेते थे और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव रखते थे। लकड़ी लेने से पहले माफी मांगना उनके लिए एक तरह से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संवेदनशीलता व्यक्त करने का तरीका था। राष्ट्रपति का यह संस्मरण पर्यावरण संरक्षण के व्यापक संदेश से जुड़ा रहा। उन्होंने बताया कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहना भारतीय जीवन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक चर्चा
दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पर्यावरण और जलवायु से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया। दुनिया के कई हिस्सों में बदलते मौसम, बढ़ते तापमान और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव के बीच ऐसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा लगातार बढ़ रही है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से यह बताने की कोशिश की कि पर्यावरण संरक्षण की भावना केवल आधुनिक नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवनशैली और संस्कारों से भी जुड़ी हुई है।
बचपन की याद से दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
राष्ट्रपति द्वारा सुनाया गया बचपन का यह किस्सा सम्मेलन के दौरान उनके संबोधन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। जंगल से सूखी लकड़ी लेने से पहले पिता का सिर झुकाकर माफी मांगना प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक था।
उन्होंने अपने अनुभव के जरिए यह संदेश दिया कि प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी वैश्विक चुनौतियों के बीच प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है। सम्मेलन के समापन सत्र में राष्ट्रपति का संबोधन इसी व्यापक विचार पर केंद्रित रहा।

