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पॉकेट डायनेमो : स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता, छोटे गांव से अंतरराष्ट्रीय सफर

नई दिल्ली, 14 जनवरी (आईएएनएस)। भारत के एक महान कुश्ती खिलाड़ी खाशाबा दादासाहेब जाधव को दुनिया 'पॉकेट डायनेमो' के नाम से जानती है। एक छोटे गांव से निकलकर उन्होंने उस समय विश्व मंच पर भारत का नाम रोशन किया, जब सुविधाएं नगण्य थीं। संघर्ष, जज्बे और देशभक्ति की मिसाल खाशाबा जाधव की कहानी आज भी भारतीय खेलों में प्रेरणा का प्रतीक बनी हुई है।
पॉकेट डायनेमो : स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता, छोटे गांव से अंतरराष्ट्रीय सफर

नई दिल्ली, 14 जनवरी (आईएएनएस)। भारत के एक महान कुश्ती खिलाड़ी खाशाबा दादासाहेब जाधव को दुनिया 'पॉकेट डायनेमो' के नाम से जानती है। एक छोटे गांव से निकलकर उन्होंने उस समय विश्व मंच पर भारत का नाम रोशन किया, जब सुविधाएं नगण्य थीं। संघर्ष, जज्बे और देशभक्ति की मिसाल खाशाबा जाधव की कहानी आज भी भारतीय खेलों में प्रेरणा का प्रतीक बनी हुई है।

15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के कराड तालुका के गोलेस्वर गांव में एक साधारण दलित परिवार में जन्मे खाशाबा के पिता दादासाहेब जाधव खुद एक प्रसिद्ध पहलवान थे। बचपन से ही कुश्ती के अखाड़ों में पले-बढ़े खाशाबा ने पांच साल की उम्र से पारंपरिक भारतीय पहलवानी शुरू की। उनकी छोटी कद-काठी (करीब 5 फुट 5 इंच) और तेज फुटवर्क ने उन्हें अलग बनाया, जिसके कारण उन्हें 'पॉकेट डायनेमो' कहा जाने लगा।

खाशाबा की कुश्ती यात्रा कॉलेज के दिनों में और तेज हुई। राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर में जब वे स्पोर्ट्स टीम में शामिल होना चाहते थे, तो शिक्षक ने उनकी कमजोर कद-काठी देखकर मना कर दिया। लेकिन जिद्दी खाशाबा ने प्रिंसिपल से अनुमति ली और इंटर-कॉलेज प्रतियोगिता में बड़े-बड़े पहलवानों को हराकर सबको चौंका दिया। उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई बार कमाल दिखाया।

1948 में लंदन ओलंपिक में स्वतंत्र भारत की पहली भागीदारी में खाशाबा फ्लाईवेट कैटेगरी में छठे स्थान पर रहे। यह उपलब्धि तब बड़ी थी जब वे मिट्टी के अखाड़ों पर प्रशिक्षित थे, जबकि अंतरराष्ट्रीय कुश्ती मैट पर होती थी। इस हार से प्रेरित होकर उन्होंने अगले चार साल कड़ी मेहनत की, जिसमें रोज 300 पुश-अप्स और 1000 सिट-अप्स तक शामिल थे। वे बैंटमवेट (57 किलो से कम) कैटेगरी में शिफ्ट हुए।

1952 हेलसिंकी ओलंपिक में खाशाबा ने इतिहास रचा। 23 जुलाई 1952 को उन्होंने कनाडा, मैक्सिको और जर्मनी के पहलवानों को हराकर कांस्य पदक जीता। यह स्वतंत्र भारत का पहला व्यक्तिगत ओलंपिक पदक था (नॉर्मन प्रिचर्ड 1900 में औपनिवेशिक भारत के लिए रजत जीते थे)।

हेलसिंकी से लौटने पर गांव वालों ने 151 बैलों की गाड़ियों के जुलूस से उनका स्वागत किया। बाद में उन्होंने पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दी। 14 अगस्त 1984 को एक रोड एक्सीडेंट में उनकी मृत्यु हो गई। जीवनभर आर्थिक तंगी और उपेक्षा झेलने के बावजूद उन्होंने कई युवा पहलवानों को प्रेरित किया।

मरणोपरांत 2000 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड, 1993 में शिव छत्रपति पुरस्कार और अन्य सम्मान मिले। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए दिल्ली में नया कुश्ती स्टेडियम उनके नाम पर रखा गया। 2023 में उनकी 97वीं जयंती पर गूगल डूडल ने उन्हें याद किया। उनकी जीवनी पर फिल्म 'खाशाबा' भी बन रही है।

--आईएएनएस

एससीएच/एएस

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