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पितृपक्ष में गयाजी में पिंडदान का क्यों है विशेष महत्व? श्राद्ध, तर्पण के लिए पहुंचते हैं लाखों लोग

पितृपक्ष में गयाजी में पिंडदान का क्यों है विशेष महत्व? श्राद्ध, तर्पण के लिए पहुंचते हैं लाखों लोग
पितृपक्ष में गयाजी में पिंडदान का क्यों है विशेष महत्व? श्राद्ध, तर्पण के लिए पहुंचते हैं लाखों लोग

नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस)। हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु बिहार के गयाजी धाम पहुंचते हैं और अपने पितरों के लिए पिंडदान करते हैं। आखिर पिंडदान के लिए गयाजी को इतना विशेष महत्व क्यों दिया गया है? हर साल लाखों लोग गयाजी पहुंचकर ही पिंडदान क्यों करना चाहते हैं?

पितृपक्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाला 16 दिनों का विशेष पक्ष है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। मान्यता है कि इन दिनों पितरों का स्मरण और उनके नाम से दान-पुण्य करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

धार्मिक ग्रंथों जैसे गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण में गयाजी को पितृ कर्मों के लिए सर्वोच्च तीर्थ बताया गया है। मान्यता है कि गयाजी में किया गया श्राद्ध और पिंडदान पितरों को विशेष फल प्रदान करता है। मान्यता है कि गयाजी में विधि-विधान से पिंडदान करने पर पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।

पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नामक तपस्वी असुर के शरीर पर भगवान विष्णु ने अपने चरण रखे थे। जिस स्थान पर भगवान विष्णु का पदचिह्न माना जाता है, वहीं आज प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर स्थित है। माना जाता है कि गयासुर के वरदान के कारण यहां किए गए पिंडदान से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।

विष्णुपद मंदिर, गयाजी में फल्गु नदी के तट पर एक प्रसिद्ध और प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे पवित्र चरण चिह्न आज भी मौजूद हैं, जिसमें शंख, चक्र और गदा जैसे नौ प्रतीक बने हैं। यह स्थान पितरों के मोक्ष और तर्पण (पिंडदान) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के लिए गयाजी में श्राद्ध किया था। वहीं, माता सीता द्वारा फल्गु नदी तट पर पिंडदान करने की कथा भी प्रचलित है।

गयाजी धाम में पिंडदान के लिए 48 प्रमुख वेदियां और कई पवित्र स्थल माने जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी तट, अक्षयवट (अक्षयवट वृक्ष), सीता कुंड, पंचतीर्थ, प्रेतशिला, रामशिला, ब्रह्मकुंड, और गया शिरोमणि क्षेत्र को महत्वपूर्ण माना गया है।

हिंदू मान्यता के अनुसार पिंडदान पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संस्कार है। माना जाता है कि गयाजी में पिंडदान करने से पितरों की अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति होती है, उन्हें शांति मिलती है और उनकी आत्मा उच्च लोकों की ओर अग्रसर होती है। धार्मिक परंपरा में गयाजी को 'पितृ तीर्थ' कहा जाता है और इसे पूर्वजों के मोक्ष का सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना गया है।

धार्मिक मान्यता और सदियों पुरानी परंपरा के कारण आज भी गयाजी धाम पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के मोक्ष और श्रद्धा के सबसे बड़े केंद्रों में गिना जाता है।

--आईएएनएस

एएमटी/डीकेपी

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