2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली PIL खारिज, वीडियो में जाने सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के फैसले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 2018 में किए गए संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि इन संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2020 के फैसले में बरकरार रख चुका है। इसलिए इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं बनता।
क्या है 2018 का संशोधन?
SC/ST एक्ट में 2018 में किए गए संशोधन के जरिए धारा 18A जोड़ी गई थी। इसके तहत इस कानून के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता को हटा दिया गया। साथ ही आरोपी की गिरफ्तारी से पहले किसी अधिकारी की अनुमति लेने की शर्त भी खत्म कर दी गई। संशोधन ने एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक को भी फिर से लागू किया।यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च 2018 के एक फैसले के बाद लाया गया था। उस फैसले में कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तारी के मामले में कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय तय किए थे। इसके बाद संसद ने कानून में बदलाव करते हुए धारा 18A जोड़ी।
2020 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन को बरकरार रखा था
2018 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। Prithvi Raj Chauhan बनाम Union of India मामले में 10 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन को बरकरार रखा था। मंगलवार की सुनवाई में याचिकाकर्ता इसी 2020 के फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग कर रहे थे, लेकिन मौजूदा बेंच ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि किसी कानून के कथित दुरुपयोग के व्यक्तिगत मामलों के आधार पर पहले से बरकरार रखे गए कानून की संवैधानिकता पर दोबारा विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत मामलों में न्यायिक जांच के रास्ते उपलब्ध हैं और अदालतें यह देख सकती हैं कि किसी मामले में SC/ST एक्ट के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।

