Samachar Nama
×

फूलदेई: राजकुमारी फ्योंली की मार्मिक कहानी से जुड़ा है वसंत का प्रतीक 'बाल लोक पर्व'

नई दिल्ली, 15 मार्च (आईएएनएस)। हिंदू कलेंडर के अनुसार चैत्र माह की शुरुआत को ही वसंत ऋतु का आगमन हो रहा है, जिसे नए साल की शुरुआत और प्रकृति से जोड़ा जाता है।
फूलदेई: राजकुमारी फ्योंली की मार्मिक कहानी से जुड़ा है वसंत का प्रतीक 'बाल लोक पर्व'

नई दिल्ली, 15 मार्च (आईएएनएस)। हिंदू कलेंडर के अनुसार चैत्र माह की शुरुआत को ही वसंत ऋतु का आगमन हो रहा है, जिसे नए साल की शुरुआत और प्रकृति से जोड़ा जाता है।

वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति का नया और सुनहरा रूप देखने को मिलता है। इसी समय देवभूमि उत्तराखंड में फूलदेई का लोकपर्व धूमधाम से मनाया जाता है। आज, यानी 15 मार्च को इस त्योहार की प्यारी छटा पूरे उत्तराखंड में देखने को मिल रही है।

फूलदेई उत्तराखंड का एक प्रमुख लोकपर्व है, जो प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं के अनूठे संगम को दर्शाता है। यह पर्व न केवल सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है, बल्कि इसमें राजकुमारी फ्योंली की मार्मिक गाथा भी रची-बसी है। इस अवसर पर बच्चे वन-उपवन से रंग-बिरंगे पुष्प एकत्रित कर घरों की दहलीज पर रखते हैं और लोकगीतों के माध्यम से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। ये बच्चें अपने परिचितों के यहां भी फूल लेकर पहुंचते हैं। गृहस्वामियों द्वारा इन बच्चों का तिलक लगाकर और आरती उतारकर स्वागत किया जाता है। बच्चों की मुख्य भागीदारी के कारण ही इसे 'बाल लोक पर्व' के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है।

फूलदेई प्रकृति से जुड़ा है, जो जीवन में नई ऊर्जा और सुख का प्रतीक है। इस मौसम में पेड़ों पर नए पत्ते और फूल आने लगते हैं और मौसम भी खुशनुमा हो जाता है। हिंदू पंचांग में चैत्र माह को साल की शुरुआत के रूप में देखा जाता है और प्रकृति भी अपना नया रूप लेती है। ऐसे में फूलदेई को प्रकृति के आगमन का लोकपर्व भी कहते हैं। फूलदेई के लोक पर्व को राजकुमारी फ्योंली की मार्मिक कहानी से जोड़कर भी देखा जाता है।

स्थानीय लोककथा के अनुसार, फ्योंली नाम की लड़की जंगलों में रहती थी और प्रकृति के बीच ही पली-बड़ी थी। एक बार शिकार पर निकले गढ़ नरेश उसके अनुपम सौंदर्य पर मुग्ध हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह के पश्चात फ्योंली महलों की रानी तो बनी, किंतु प्रकृति से दूरी उसे भीतर ही भीतर कचोटने लगी। विरह और बीमारी के कारण अंततः उसने अपने प्राण त्याग दिए। मृत्यु पूर्व उसकी अंतिम इच्छा थी कि उसे उसी वन की गोद में समाधि दी जाए, जहां उसका बचपन बीता था।।

कहा जाता है कि फ्योंली की मृत्यु के बाद जहां उन्हें जंगलों में दफनाया गया, वहां चैत्र में महीनें में पीले फूल उगले लगे। इन फूलों को फ्योंली नाम दिया गया। इसी कारण है कि फूलदेई के दिन पीले फूलों का महत्व अधिक है और इसे वसंत के रूप में भी देखा जाता है।

--आईएएनएस

पीएस/एएस

Share this story

Tags