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‘हाथ-पैर काटने जैसी सजा होगी तभी कानून का पालन करेंगे लोग’: कर्नाटक हाईकोर्ट की टिप्पणी पर चर्चा तेज

Karnataka

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट की एक टिप्पणी ने न्याय व्यवस्था, कानून के पालन और अपराध नियंत्रण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मौजूदा समय में लोग कानूनों का पालन करने के प्रति गंभीर नहीं दिखते और स्थिति ऐसी हो गई है कि “यदि हाथ-पैर काटने जैसी कठोर सजा दी जाए, तभी लोग कानून का सम्मान करेंगे।” अदालत की यह टिप्पणी अब कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है।

यह टिप्पणी उस समय आई जब हाईकोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें अदालत के आदेशों और कानूनी प्रावधानों के पालन को लेकर सवाल उठे थे। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने बढ़ती कानून उल्लंघन की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोगों में कानून का डर लगातार कम होता जा रहा है।

अदालत ने कहा कि नियमों और न्यायिक आदेशों की अनदेखी की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कई बार चेतावनी, जुर्माना और अन्य कानूनी कार्रवाइयों के बावजूद लोग नियमों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते। इसी संदर्भ में न्यायालय ने टिप्पणी की कि कठोर दंड की आशंका ही लोगों को कानून का पालन करने के लिए मजबूर कर सकती है।

हालांकि, अदालत की यह टिप्पणी किसी वास्तविक सजा का प्रस्ताव नहीं थी, बल्कि कानून के प्रति बढ़ती उदासीनता पर चिंता जताने के लिए की गई एक मौखिक टिप्पणी (oral observation) थी। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का सम्मान और स्वैच्छिक पालन बेहद महत्वपूर्ण है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतें अक्सर सुनवाई के दौरान समाज और प्रशासन को संदेश देने के लिए ऐसी टिप्पणियां करती हैं। इन टिप्पणियों का उद्देश्य किसी विशेष प्रकार की सजा लागू करने की वकालत करना नहीं होता, बल्कि कानून व्यवस्था की स्थिति पर चिंता व्यक्त करना होता है।

इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस शुरू हो गई है। कुछ लोगों का मानना है कि बढ़ते अपराधों और नियमों की अवहेलना को देखते हुए कानून का सख्ती से पालन कराना जरूरी है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में कठोर शारीरिक दंड समाधान नहीं हो सकता और कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए जागरूकता, प्रभावी पुलिसिंग और तेज न्यायिक प्रक्रिया अधिक महत्वपूर्ण हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का संविधान और न्यायिक व्यवस्था मानवाधिकारों तथा विधि के शासन (Rule of Law) के सिद्धांतों पर आधारित है। इसलिए किसी भी प्रकार की सजा संविधान और स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुरूप ही दी जा सकती है। अदालत की टिप्पणी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न अदालतों ने सड़क सुरक्षा, अवैध निर्माण, पर्यावरण संरक्षण और न्यायिक आदेशों की अवहेलना जैसे मामलों में लोगों की लापरवाही पर कई बार नाराजगी जाहिर की है। न्यायपालिका लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि कानून केवल किताबों में लिखे नियम नहीं हैं, बल्कि समाज में व्यवस्था बनाए रखने का आधार हैं।

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