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रोड शो के बीच पीएम मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक थंथानिया कालीबाड़ी में की पूजा-अर्चना

कोलकाता, 26 अप्रैल (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचार करने के लिए रविवार को कोलकाता पहुंचे। उन्होंने थंथानिया कालीबाड़ी में मां काली का आशीर्वाद लिया। थंथानिया कालीबाड़ी कोलकाता के सबसे पुरानी काली मंदिरों में से एक है।
रोड शो के बीच पीएम मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक थंथानिया कालीबाड़ी में की पूजा-अर्चना

कोलकाता, 26 अप्रैल (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचार करने के लिए रविवार को कोलकाता पहुंचे। उन्होंने थंथानिया कालीबाड़ी में मां काली का आशीर्वाद लिया। थंथानिया कालीबाड़ी कोलकाता के सबसे पुरानी काली मंदिरों में से एक है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रोड शो के दौरान इस मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करने का कार्यक्रम पहले से ही तय था। प्रधानमंत्री रोड शो करते हुए मंदिर तक पहुंचे। इसके बाद वह फूल-माला लेकर मंदिर में पहुंचे, दर्शन किए और मंदिर से निकलकर फिर रोड शो में शामिल हो गए।

पीएम मोदी ने मंदिर में दर्शन के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि कोलकाता में, मैंने थंथानिया कालीबाड़ी में प्रार्थना की। इस प्राचीन मंदिर का बंगाली संस्कृति और विशेष रूप से कोलकाता से गहरा संबंध है। इसका श्री रामकृष्ण से भी गहरा जुड़ाव है, जो अक्सर यहां प्रार्थना करने आते थे। उन्होंने आगे लिखा कि मैंने भारत के लोगों की समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए प्रार्थना की।

थंथानिया कालीबाड़ी मंदिर की स्थापना वर्ष 1703 में हुई थी। इसका 300 साल से भी पुराना इतिहास कोलकाता शहर के औपचारिक विकास से भी पहले का माना जाता है।

इस मंदिर में मां काली की पूजा ‘मां सिद्धेश्वरी’ के रूप में की जाती है। यहां विराजमान देवी को ‘जागृत’ माना जाता है।

मान्यता है कि रामकृष्ण परमहंस इस मंदिर में अक्सर आया करते थे और मां सिद्धेश्वरी की भक्ति में भजन गाते थे। मंदिर के अंदर उनकी कही एक पंक्ति आज भी दीवारों पर अंकित है, 'शंकरेर हृदय माझे, काली बिराजे', जिसका अर्थ है 'मां काली, शंकर के हृदय में विराजमान हैं।'

यह भारत के उन चुनिंदा काली मंदिरों में से एक है, जहां मां काली को मांसाहारी प्रसाद चढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि यह परंपरा रामकृष्ण परमहंस ने शुरू की थी।

बताया जाता है कि उन्होंने 'डाब-चिंगड़ी' (नारियल और झींगा) का भोग मां सिद्धेश्वरी को अर्पित किया था और ब्रह्मानंद केशव चंद्र सेन के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी।

उसी दिन से मां काली को मांसाहारी प्रसाद चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है। यह भी कहा जाता है कि जब रामकृष्ण परमहंस श्यामपुकुर में बीमार पड़े थे, तब उनके अनुयायियों ने मां सिद्धेश्वरी से उनके जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी और देवी को मांसाहारी प्रसाद अर्पित किया था।

--आईएएनएस

एएमटी/वीसी

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