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'पढ़ना बंद कर देने वाला समाज धीरे-धीरे गहन चिंतन करने की क्षमता खो देता है': उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को उपराष्ट्रपति भवन में पीपी सत्यन द्वारा लिखित पुस्तक 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया: द स्टोरी ऑफ पीएन पणिक्कर' का विमोचन किया। सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने पीएन पणिक्कर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उन्हें एक दूरदर्शी व्यक्ति बताया जिन्होंने पुस्तकों और ज्ञान की मौन शक्ति के माध्यम से लाखों लोगों के भाग्य को बदल दिया। लेखक पीपी सत्यन को बधाई देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह प्रकाशन पणिक्कर की असाधारण दूरदृष्टि और अमिट विरासत का प्रमाण है।
'पढ़ना बंद कर देने वाला समाज धीरे-धीरे गहन चिंतन करने की क्षमता खो देता है': उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को उपराष्ट्रपति भवन में पीपी सत्यन द्वारा लिखित पुस्तक 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया: द स्टोरी ऑफ पीएन पणिक्कर' का विमोचन किया। सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने पीएन पणिक्कर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उन्हें एक दूरदर्शी व्यक्ति बताया जिन्होंने पुस्तकों और ज्ञान की मौन शक्ति के माध्यम से लाखों लोगों के भाग्य को बदल दिया। लेखक पीपी सत्यन को बधाई देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह प्रकाशन पणिक्कर की असाधारण दूरदृष्टि और अमिट विरासत का प्रमाण है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि पणिक्कर ने सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भी एक असाधारण सपना देखा था कि जाति, वर्ग, गरीबी या भौगोलिक स्थिति की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होना चाहिए। केरल के कुट्टानाड में पणिक्कर के साधारण आरंभ को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि पणिक्कर ने जीवन के शुरुआती दौर में ही यह समझ लिया था कि निरक्षरता केवल पढ़ने में असमर्थता नहीं है, बल्कि यह गरिमा, अवसर और मानवीय प्रगति में बाधा है।

केरल में पुस्तकालय और साक्षरता आंदोलन की शुरुआत में पणिक्कर की भूमिका का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सनातन धर्म पुस्तकालय नामक एक साधारण से वाचनालय से शुरू हुआ यह प्रयास अंततः केरल के सामाजिक और बौद्धिक परिदृश्य में परिवर्तन लाने में सहायक रहा। उन्होंने आगे कहा कि पणिक्कर ने गांवों और दूरदराज के आदिवासी बस्तियों में अथक यात्राएं कीं और 'पढ़ो और आगे बढ़ो' के सरल लेकिन शक्तिशाली संदेश के माध्यम से आम लोगों और स्वयंसेवकों को प्रेरित किया।

पणिक्कर को केरल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जनक बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनका मानना ​​था कि ज्ञान कभी भी कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं रहना चाहिए, बल्कि मानवता की सेवा करनी चाहिए और सामाजिक जागृति की शक्ति बनना चाहिए।

पुस्तकालयों के विकास पर बोलते हुए, उपराष्ट्रपति ने नालंदा और तक्षशिला जैसे भारत के गौरवशाली शिक्षा केंद्रों की परंपरा का उल्लेख किया, जिन्होंने विश्व भर के विद्वानों को आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि पुस्तकालय ई-पुस्तकों, डिजिटल अभिलेखागारों और ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुके हैं, फिर भी युवाओं में पढ़ने की आदतों में लगातार गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।

मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और संक्षिप्त मनोरंजन पर अत्यधिक निर्भरता पर चिंता व्यक्त करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि गहन पठन, चिंतन और विचारपूर्वक सीखना धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि प्रौद्योगिकी ने सुविधा तो प्रदान की है, लेकिन साथ ही धैर्य, एकाग्रता और साहित्य एवं ज्ञान के साथ सार्थक जुड़ाव को भी कम कर दिया है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मक कल्पना और गहन समझ की क्षमता खो देता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया' जैसी पुस्तकें युवा पीढ़ी में पढ़ने और चिंतन की संस्कृति को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

एन. बालागोपाल के नेतृत्व में पीएन पणिक्कर फाउंडेशन के कार्यों की सराहना करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि फाउंडेशन पठन और अधिगम को बढ़ावा देने के उल्लेखनीय प्रयासों के माध्यम से पणिक्कर की विरासत को आगे बढ़ा रहा है।

उपराष्ट्रपति ने भारत के ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से सरकार की कई पहलों पर भी प्रकाश डाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'मन की बात' में साझा किए गए दृष्टिकोण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तकालयों को रचनात्मकता के गतिशील केंद्रों के रूप में विकसित होना चाहिए। उन्होंने देश भर के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय अकादमिक शोध और पत्रिकाओं तक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार की 'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' पहल की भी सराहना की।

उन्होंने प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से भारत की अमूल्य हस्तलिखित विरासत को संरक्षित करने, डिजिटाइज करने और प्रसारित करने के प्रयासों के लिए ज्ञान भारतम मिशन की प्रशंसा भी की।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि पणिक्कर की महानता केवल पुस्तकालयों के निर्माण में ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों में आशा, जागरूकता और आत्मविश्वास जगाने में भी निहित है। उन्होंने कहा कि एक पुस्तकालय बच्चे का भविष्य बदल सकता है। एक किताब जीवन को रूपांतरित कर सकती है। और एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति पूरे समाज को बदल सकता है।

उपराष्ट्रपति ने समाज से पढ़ने, सीखने और ज्ञान के प्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को नवीकृत करने का आह्वान किया और माता-पिता, शिक्षकों और संस्थानों से बच्चों को पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने का आग्रह किया।

--आईएएनएस

एमएस/

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