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'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल : इंडियन आर्मी के ‘ड्रोन वॉरियर’ तैयार, सेना के हर फॉर्मेशन में एक्सपर्ट मौजूद

नई दिल्ली, 5 मई (आईएएनएस)। 'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल पूरा होने वाला है। इस एक साल के भीतर भारतीय सेना ने मॉडर्न वॉरफेयर के सबसे घातक हथियार बनकर उभरे ड्रोन पर महारत हासिल कर ली है। थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कारगिल विजय दिवस के मौके पर ‘अश्नि प्लाटून’ का ऐलान किया था, और अब यह काम भी पूरा हो चुका है। इन प्लाटून की तैनाती भी की जा चुकी है।
'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल : इंडियन आर्मी के ‘ड्रोन वॉरियर’ तैयार, सेना के हर फॉर्मेशन में एक्सपर्ट मौजूद

नई दिल्ली, 5 मई (आईएएनएस)। 'ऑपरेशन सिंदूर' के एक साल पूरा होने वाला है। इस एक साल के भीतर भारतीय सेना ने मॉडर्न वॉरफेयर के सबसे घातक हथियार बनकर उभरे ड्रोन पर महारत हासिल कर ली है। थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कारगिल विजय दिवस के मौके पर ‘अश्नि प्लाटून’ का ऐलान किया था, और अब यह काम भी पूरा हो चुका है। इन प्लाटून की तैनाती भी की जा चुकी है।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, सेना ने ड्रोन प्रशिक्षण के पहले चरण में बेसिक ट्रेनिंग पूरी कर ली है। यानी अब सेना की इन्फैंट्री बटालियन के हर जवान को ड्रोन की बेसिक ट्रेनिंग दी जा चुकी है। यह बेसिक ट्रेनिंग यूनिट स्तर पर शुरू की गई थी। दूसरे चरण में फॉर्मेशन स्तर पर स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग जारी है। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, यूनिट स्तर पर दी गई बेसिक ट्रेनिंग के बाद सबसे बेहतर ड्रोन ऑपरेट करने वाले सैनिकों को चुना जाता है, जिन्हें आगे एडवांस ट्रेनिंग दी जाती है।

यह ट्रेनिंग दो चरणों में दी जा रही है। पहले चरण में सैनिकों को सिम्युलेटर पर 15 से 20 घंटे तक ड्रोन ऑपरेट करना सिखाया जाता है। इसके बाद फील्ड ट्रेनिंग होती है, जहां उन्हें विभिन्न बाधाओं को पार करने और वास्तविक परिस्थितियों में ड्रोन संचालन में महारत हासिल कराई जाती है।

फॉर्मेशन स्तर पर स्पेशलाइज्ड एडवांस ट्रेनिंग सेंटर में हर बैच में लगभग 20 से 25 सैनिकों को 2 से 3 हफ्तों तक प्रशिक्षित किया जाता है। भारतीय सेना अपने फॉर्मेशन के अलावा अन्य सेवाओं के जवानों को भी ट्रेनिंग दे रही है।

ट्रेनिंग में सर्विलांस ड्रोन, फर्स्ट पर्सन व्यू (एफपीवी) ड्रोन, आर्म्ड ड्रोन और लॉजिस्टिक ड्रोन शामिल हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने न केवल ड्रोन का इस्तेमाल किया, बल्कि पाकिस्तान के ड्रोन को भी मार गिराया।

भारतीय सेना पहले से ही इस नए हथियार के लिए तैयारी कर रही थी और उसने तेजी से अपने ‘ड्रोन वॉरियर’ तैयार करने शुरू कर दिए थे। इसका पहला चरण पूरा हो चुका है। इसके लिए खास तौर पर ड्रोन ट्रेनिंग नोड्स तैयार किए गए हैं और अब इनकी संख्या बढ़ाई जा रही है।

सेना ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम की खरीद और तैनाती भी बढ़ा रही है। इन्फैंट्री की हर बटालियन में एक ड्रोन प्लाटून स्थापित किया गया है, जिसे ‘ अश्नि प्लाटून’ नाम दिया गया है।

इसके साथ ही ड्रोन ट्रेनिंग सेंटर और अकादमियां भी स्थापित की जा रही हैं। देहरादून स्थित आईएमए, महू का इन्फैंट्री स्कूल और चेन्नई की ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (ओटीए) में ये पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं।

सेना के जवानों के साथ-साथ यूनिट के अधिकारियों को भी ड्रोन ऑपरेट करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। भारतीय सेना के इस ड्रोन कॉन्सेप्ट को ‘ईगल इन द आर्म’ नाम दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य है कि हर सैनिक ड्रोन ऑपरेट करना सीखे।

जिस तरह से जवान अपने हथियार को ऑपरेट करते हैं और हमेशा अपने साथ रखते हैं, उसी तरह वे ड्रोन का भी प्रभावी उपयोग कर सकें। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, सैनिकों को उनके कार्य के अनुसार ड्रोन उपयोग के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है—जैसे कॉम्बैट, सर्विलांस, लॉजिस्टिक्स और यहां तक कि मेडिकल इवैक्यूएशन के लिए।

ड्रोन ऑपरेट करने के साथ-साथ दुश्मन के ड्रोन को काउंटर करने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इससे एक लेयर्ड सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जो ड्रोन का उपयोग करने और उन्हें निष्क्रिय करने—दोनों में सक्षम होगा। सेना का लक्ष्य है कि साल 2027 तक इन्फैंट्री यूनिट के 100 प्रतिशत जवान ड्रोन ऑपरेट करने में माहिर हो जाएं।

--आईएएनएस

डीकेपी/

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