“हे ईश्वर, दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है”, सबके लिए आसान नहीं है जिंदगी Video
जब इंसान अपने दुःख में डूबा होता है, तो उसे लगता है कि उससे बड़ा दर्द किसी का नहीं। लेकिन जैसे ही वह दुनिया की ओर नजर उठाता है, उसे एहसास होता है कि हर चेहरे के पीछे कोई न कोई कहानी छुपी है—किसी ने अपनों को खोया है, कोई भूख से लड़ रहा है, कोई अन्याय और अत्याचार सह रहा है। तब मन से यही आवाज़ निकलती है—हे ईश्वर, दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है।
यह पंक्ति हमें सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयाँ केवल हमारे हिस्से नहीं आतीं। सड़कों पर मेहनत करता मजदूर, अस्पताल के बाहर इंतज़ार करता परिजन, सीमाओं पर तैनात सैनिक का परिवार—हर कोई अपने‑अपने संघर्ष से गुजर रहा है। उनके सामने हमारी कई शिकायतें छोटी लगने लगती हैं।
यह भाव हमें कृतज्ञता का पाठ पढ़ाता है। इसका मतलब यह नहीं कि हमारा दर्द झूठा है, बल्कि यह कि हमें अपने दुःख के साथ‑साथ दूसरों के दुःख को भी समझना चाहिए। जब इंसान दूसरों की पीड़ा को महसूस करता है, तो उसका मन विनम्र हो जाता है और अहंकार स्वतः टूटने लगता है।
समाज में बढ़ती संवेदनहीनता के बीच यह सोच इंसानियत को जिंदा रखती है। जब हम यह मान लेते हैं कि दुनिया में हमसे कहीं ज्यादा दुख झेलने वाले लोग हैं, तो हम सहनशील बनते हैं, धैर्य सीखते हैं और दूसरों की मदद के लिए आगे बढ़ते हैं।
शायद यही वजह है कि यह पंक्ति सिर्फ एक दुआ नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह हमें सिखाती है कि दुख के समय शिकायत से ज्यादा समझ और संवेदना जरूरी है। क्योंकि सच ही है—दुनिया में ग़म बहुत हैं, और अगर तुलना करें, तो कई बार हमारा ग़म वाकई बहुत कम होता है।

