निर्वासित तिब्बती सरकार ने चीन के नए कानून का किया विरोध, आजादी की मांग दोहराई
धर्मशाला, 20 अगस्त (आईएएनएस)। तिब्बती शहीद लोबसांग पाल्डेन (लोबगा रंगज़ेन) के सर्वोच्च बलिदान के 49वें दिन गुरुवार को धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार (सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन-सीटीए) और निर्वासित तिब्बती संसद की ओर से संयुक्त रूप से प्रार्थना सभा और शांति मार्च आयोजित किया गया। मैक्लोडगंज स्थित त्सुगलाखंग से शुरू हुआ यह मार्च धर्मशाला पुलिस मैदान तक निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में तिब्बती समुदाय, निर्वासित सरकार के प्रतिनिधि और तिब्बत समर्थक शामिल हुए।
निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री (सिक्योंग) पेम्पा त्सेरिंग ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि यह मार्च केवल लोबसांग पाल्डेन के बलिदान को श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं, बल्कि चीन की उन नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने के लिए भी आयोजित किया गया है, जिनका उद्देश्य तिब्बतियों की अलग सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान को खत्म करना है।
उन्होंने कहा कि लोबसांग पाल्डेन ने चीन के लगातार दमन और हाल ही में लागू किए गए "जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले कानून" के विरोध में आत्मदाह किया था। उनके बलिदान के 49वें दिन तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार विशेष महत्व होता है, क्योंकि इसे 'बारदो' यानी मृत्यु के बाद की 49 दिवसीय मध्यवर्ती अवस्था के पूर्ण होने का प्रतीक माना जाता है।
पेम्पा त्सेरिंग ने कहा कि हाल में लागू किया गया यह कानून नाम से भले ही एकता और प्रगति की बात करता हो, लेकिन व्यवहार में इसका उद्देश्य तिब्बतियों, उइगरों, मंगोलों और चीन में आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त अन्य जातीय अल्पसंख्यक समुदायों का 'चीनीकरण' (सिनिसाइजेशन) करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन अलग-अलग समुदायों की भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और राष्ट्रीय पहचान को समाप्त कर उन्हें एकरूप चीनी पहचान में समाहित करने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने कहा कि यह शांति मार्च दुनिया भर के तिब्बतियों और तिब्बत समर्थकों के लिए एकजुटता का संदेश है। इसका उद्देश्य चीन की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से सामूहिक आवाज उठाना है, न कि किसी प्रकार की हिंसा या आत्मदाह जैसी घटनाओं को बढ़ावा देना।
सिक्योंग ने स्पष्ट किया कि सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन आत्मदाह को आंदोलन का रास्ता नहीं मानता। उन्होंने कहा कि एक भी तिब्बती देशभक्त की जान जाना पूरे तिब्बती आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है। इसलिए यह मार्च लोगों से शांतिपूर्ण संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय समर्थन को मजबूत करने की अपील करता है।
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह त्सुगलाखंग मंदिर में दो घंटे की प्रार्थना सभा से हुई, जहां तिब्बत के भीतर और बाहर शहीद हुए सभी तिब्बती देशभक्तों को श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान उनके परिवारों के प्रति एकजुटता भी व्यक्त की गई। प्रार्थना सभा के बाद शांति मार्च मैक्लोडगंज से धर्मशाला पुलिस मैदान तक निकाला गया।
निर्वासित तिब्बती सरकार ने दुनिया भर के सभी तिब्बती सेटलमेंट कार्यालयों और तिब्बत कार्यालयों को भी निर्देश जारी किए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इसी तरह की प्रार्थना सभाएं आयोजित करें, ताकि तिब्बती समुदाय सामूहिक रूप से उन लोगों को याद कर सके जिन्होंने तिब्बत के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है।
पेम्पा त्सेरिंग ने बताया कि जुलाई की शुरुआत से दुनिया के कई देशों में तिब्बती समुदाय ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन, अभियान और जनजागरण कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य चीन की अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति नीतियों का विरोध करना और लोबसांग पाल्डेन की आवाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाना है।
उन्होंने कहा कि इन अभियानों में उइगर, मंगोलियाई और लोकतंत्र समर्थक चीनी समुदायों के लोग भी शामिल हुए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि चीन की बढ़ती 'एसीमिलेशनिस्ट' नीतियों को लेकर कई समुदाय समान चिंताएं साझा कर रहे हैं और अपनी सांस्कृतिक व धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए एकजुट हो रहे हैं।
पेम्पा त्सेरिंग ने दावा किया कि चीन के नए कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई देशों ने इस कानून की आलोचना की है या इस पर चिंता जताई है।
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने भी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में इस कानून पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे अल्पसंख्यक भाषाओं में शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं यूरोपीय संसद ने भी इस कानून की निंदा करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।
सिक्योंग ने कहा कि तिब्बती समुदाय का संघर्ष अपनी पहचान, संस्कृति, भाषा और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए है और यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित रहेगा। उन्होंने दुनिया भर के तिब्बत समर्थकों से अपील की कि वे तिब्बती लोगों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहें।
--आईएएनएस
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