Nashik Kumbh Mela: 517 श्रद्धालुओं ने एक साथ बजाए शंख, नासिक में बना गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड
महाराष्ट्र के नाशिक में श्रद्धालुओं ने सामूहिक शंखनाद कर नया विश्व रिकॉर्ड बना दिया। रविवार को गोदावरी नदी के किनारे आयोजित कार्यक्रम में 517 लोगों ने एक साथ शंख बजाया और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया। यह आयोजन आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले के ध्वजारोहण समारोह से पहले किया गया।
5 मिनट 30 सेकंड तक गूंजा शंखनाद
नाशिक के देवमामलेदार यशवंत महाराज पटांगण में आयोजित इस कार्यक्रम में 517 प्रतिभागियों ने पांच मिनट 30 सेकंड तक एक साथ शंख बजाया। आयोजकों के मुताबिक, इस विशेष आयोजन के लिए चेन्नई से प्रमाणित शंख मंगवाए गए थे।
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के वरिष्ठ निर्णायक ऋषि नाथ ने कार्यक्रम के दौरान रिकॉर्ड की घोषणा की। इससे पहले एक साथ शंख बजाने का रिकॉर्ड 2019 में अमेरिका के न्यू जर्सी में बना था, जहां 303 लोगों ने सामूहिक शंखनाद किया था।
31 अक्टूबर को होगा कुंभ मेले का ध्वजारोहण
नाशिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले का ध्वजारोहण समारोह 31 अक्टूबर को दोपहर 12:02 बजे नाशिक के रामकुंड में आयोजित किया जाना है। इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित किया गया है। समारोह के दौरान गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स का प्रमाणपत्र सौंपे जाने की भी जानकारी दी गई है।
नाशिक-त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेला प्राधिकरण के कमिश्नर शेखर सिंह के मुताबिक, शंखनाद की यह पहल धार्मिक परंपरा को कुंभ मेले की शुरुआत से जोड़ने के उद्देश्य से की गई है। ध्वजारोहण के अवसर पर 251 प्रतिभागियों के शंख बजाने का कार्यक्रम भी प्रस्तावित है।
करोड़ों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद
नाशिक और त्र्यंबकेश्वर में आयोजित होने वाला सिंहस्थ कुंभ मेला हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में से एक है। यह आयोजन परंपरागत रूप से प्रत्येक 12 वर्ष में होता है। आगामी मेले की अवधि 31 अक्टूबर से 24 जुलाई 2028 तक निर्धारित बताई गई है।
सरकार के अनुमान के अनुसार, मेले के दौरान नाशिक में 8 से 10 करोड़ और त्र्यंबकेश्वर में करीब 4 करोड़ श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। आयोजन के दौरान दोनों शहरों में धार्मिक गतिविधियां और पवित्र स्नान प्रमुख आकर्षण रहेंगे।
नाशिक कुंभ की विशेषता यह है कि वैष्णव और शैव अखाड़ों के स्नान अलग-अलग तीर्थस्थलों पर होते हैं। नाशिक और त्र्यंबकेश्वर को इस धार्मिक आयोजन के दो प्रमुख केंद्र माना जाता है।
नाशिक के कुंभ को क्यों कहते हैं सिंहस्थ?
नाशिक के कुंभ मेले को सिंहस्थ कहा जाता है, क्योंकि इसकी पारंपरिक ज्योतिषीय गणना में बृहस्पति के सिंह राशि में प्रवेश का विशेष महत्व है। कुंभ मेले की तिथियां धार्मिक परंपराओं, ग्रहों की स्थिति और अखाड़ों की सहमति के आधार पर तय की जाती हैं।
हिंदू मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश से अमृत की बूंदें प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नाशिक में गिरी थीं। इसी धार्मिक मान्यता से इन चार स्थानों पर कुंभ मेले की परंपरा जुड़ी हुई है।
नाशिक में 517 श्रद्धालुओं का सामूहिक शंखनाद न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि इसने शहर को एक नए वैश्विक रिकॉर्ड के कारण भी चर्चा में ला दिया।

