नैनीताल की पहाड़ियों में बसा देवगुरु बृहस्पति मंदिर, खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं देवगुरु
उत्तराखंड, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। नैनीताल अपनी खूबसूरत पड़ाडियों, शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। इन्हीं पहाड़ों की चोटियों के बीच स्थित 'देवगुरु बृहस्पति मंदिर' आस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। मान्यता है कि संकट के समय देवगुरु बृहस्पति ने इसी पर्वत पर तपस्या की थी। नैनीताल जिले के ओखलकांडा इलाके में प्रकृति की मनमोहक छटा के बीच स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र भी है।
दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामनापूर्ती और मंदिर की दिव्य शांति का आनंद लेने के लिए भी आते हैं। गुरुवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंदिर के इतिहास और दिव्य वातावरण का वर्णन किया है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट किया, जिसके साथ उन्होंने लिखा, "नैनीताल जिले के ओखलकांडा इलाके में पहाड़ों की चोटियों के बीच बसा देवगुरु बृहस्पति मंदिर कई भक्तों की आस्था का केंद्र है। इस जगह को देवगुरु बृहस्पति की तपस्या का पवित्र स्थान भी माना जाता है।
कुदरत की बेमिसाल सुंदरता और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे इस पवित्र मंदिर में पहुंचकर मन को एक अनोखी शांति का अनुभव होता है। नैनीताल जिले में आने पर आपको भी इस पवित्र मंदिर में जरूर दर्शन करने चाहिए।"
'देवगुरु बृहस्पति मंदिर' को विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए विशेष रूप से बुद्धि व ज्ञान का केंद्र माना जाता है। श्रद्धालु यहां कुंडली से गुरु दोष निवारण के लिए भी आते हैं। हर गुरुवार को यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है, जिसमें पीले वस्त्र, पीले फूल और चने की दाल अर्पित की जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पर्वत स्वयं देवताओं के गुरु बृहस्पति देव की मुख्य तपस्थली रहा है। कहा जाता है कि जब भी देवताओं पर कोई भारी संकट आता था या देवासुर संग्राम की स्थितियां बनती थीं, तब देवगुरु इसी शांत पर्वत पर आकर चिंतन और कठिन तपस्या करते थे।
माना जाता है कि इसी स्थान पर की गई घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें नवग्रहों में स्थान और देवताओं के 'गुरु' का सर्वोच्च पद प्रदान किया था। इसी कारण इस चोटी को देवगुरु पर्वत के नाम से जाना जाता है।
इस दरबार की सबसे अनोखी और चमत्कारी विशेषता यह है कि यहां स्थापित देवगुरु बृहस्पति की पिंडी खुले आकाश के नीचे विराजमान है, मंदिर के ऊपर कोई छत या आच्छादन नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले के समय में कई लोगों ने यहां पर भव्य मंदिर निर्माण कराने के लिए पत्थरों की खुदाई करवाई थी, लेकिन हर पत्थर के नीचे से सांपों का झुंड निकलने लगा। साथ ही, वे पत्थर भी इतने भारी हो गए कि कोई उन्हें हिला तक नहीं सका।
इस तरह की घटना के बाद स्थानीय लोगों और भक्तों ने इसे देवगुरु का संकेत माना कि वे खुले आसमान के नीचे ही विराजमान होना चाहते हैं, जिसके बाद कभी निर्माण कार्य नहीं हुआ।
--आईएएनएस
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