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न सीमेंट, न सरिया, जड़ों से बनते हैं पुल, मेघालय की सदियों पुरानी 'जिंदा इंजीनियरिंग' की कहानी

न सीमेंट, न सरिया, जड़ों से बनते हैं पुल, मेघालय की सदियों पुरानी 'जिंदा इंजीनियरिंग' की कहानी
न सीमेंट, न सरिया, जड़ों से बनते हैं पुल, मेघालय की सदियों पुरानी 'जिंदा इंजीनियरिंग' की कहानी

शिलांग, 22 सितंबर (आईएएनएस)। मेघालय की पहाड़ियों में रबर फिग के पेड़ों की जड़ों को दिशा देकर तैयार किए गए 'लिविंग रूट ब्रिज' आज भी इंसान और प्रकृति के असाधारण रिश्ते की कहानी कहते हैं। यह तकनीक आधुनिक निर्माण की गति से भले ही मेल न खाती हो, लेकिन इसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य की ऐसी समझ दिखाई देती है, जो आज के दौर में पर्यावरणीय संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी अनूठी परंपरा और इसके पीछे छिपे स्थानीय ज्ञान को करीब से समझने का अवसर उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रतिनिधिमंडल को मिला।

'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने पूर्वी खासी हिल्स के सीज गांव में पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् हैली वार से संवाद किया। हैली वार ने बताया कि मेघालय के खासी समुदाय के लिए जीवित जड़ पुल केवल नदी, नाले या घाटी पार करने का जरिया नहीं हैं। इनके पीछे प्रकृति को समझने, उसके साथ काम करने और उसे अगली पीढ़ी के लिए बचाए रखने की सोच है। स्थानीय लोग रबर फिग की हवाई जड़ों को विशेष दिशा में बढ़ाते हैं। जड़ों को सहारा दिया जाता है, उन्हें आपस में जोड़ा जाता है और लगातार उनकी देखभाल की जाती है।

वर्षों के इस धैर्यपूर्ण प्रयास के बाद जड़ें एक मजबूत पुल का रूप ले लेती हैं। लिविंग रूट ब्रिज की सबसे खास बात इसकी जीवंत संरचना है। सामान्य पुल जहां समय और मौसम के साथ क्षतिग्रस्त होते हैं, वहीं इन पुलों की जड़ें लगातार बढ़ती रहती हैं। उनकी देखभाल और मरम्मत भी इसी प्राकृतिक प्रक्रिया के साथ चलती रहती है। यही वजह है कि किसी पुल को तैयार करने में वर्षों, कई बार दशकों तक का समय लग सकता है। हैली वार ने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को बताया कि जीवित जड़ पुलों की परंपरा खासी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा है।

स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, भारी बारिश और पहाड़ी इलाकों में आवागमन की जरूरतों ने इस तकनीक को विकसित किया। यहां प्रकृति को हटाकर रास्ता बनाने के बजाय प्रकृति को ही रास्ता बनाने के लिए तैयार किया गया। यही वजह है कि ‘जिंगकिएंग जरी’ केवल पारंपरिक वास्तुकला नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की पर्यावरणीय समझ का भी उदाहरण है। इसमें जंगल, पेड़, पानी और इंसान के बीच संबंध को एक साथ देखा जाता है। पूर्वी खासी हिल्स के सीज गांव निवासी हैली वार ने इस पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए लंबे समय से काम किया है।

स्थानीय समुदायों को जड़ पुलों की देखभाल, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ना उनके प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। उनके इसी योगदान को 2026 में पद्म श्री सम्मान से राष्ट्रीय पहचान मिली। सामाजिक कार्य और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के साथ खासी समुदाय की पारंपरिक जैव-अभियांत्रिकी और जीवित जड़ पुलों के संरक्षण के प्रयासों को भी व्यापक पहचान मिली। किसान के रूप में हैली वार सुपारी, पान, काली मिर्च और विभिन्न फलदार फसलों की खेती करते हैं। खेती और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने वाली उनकी जीवनशैली यह बताती है कि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच भी उपयोगी हो सकता है।

चेरापूंजी, नोंग्रियात और खासी पहाड़ियों के कई इलाकों में मौजूद जीवित जड़ पुल देश-विदेश के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र हैं। लेकिन इनका महत्व केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है। ये पुल स्थानीय समुदायों की सामूहिक मेहनत, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ उनके रिश्ते का दस्तावेज भी हैं। हैली वार से संवाद का सबसे अहम संदेश यही रहा कि विकास और प्रकृति को हमेशा आमने-सामने खड़ा करने की जरूरत नहीं है। मेघालय के जीवित जड़ पुल इसी सोच की जीवंत मिसाल हैं। ये पुल केवल एक किनारे को दूसरे किनारे से नहीं जोड़ते, बल्कि इंसान और प्रकृति, परंपरा और आधुनिकता तथा एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से जोड़ने वाली जीवित कड़ी बन चुके हैं।

--आईएएनएस

विकेटी/एसके

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