Mysore Dasara: 61 साल के हाथी अभिमन्यु की आखिरी जंबो सवारी, 26 साल तक उठाया 750 किलो का सोने का हौदा
कर्नाटक के विश्वप्रसिद्ध मैसूर दशहरा उत्सव में इस बार एक भावुक विदाई देखने को मिलेगी। 61 वर्षीय हाथी अभिमन्यु आखिरी बार शाही जंबो सवारी का नेतृत्व करता नजर आएगा। करीब 26 साल तक इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा रहे अभिमन्यु ने वर्ष 2000 से लगातार 750 किलो वजनी सोने का हौदा उठाकर मां चामुंडेश्वरी की यात्रा की अगुवाई की है।
मैसूर के लोगों के बीच अभिमन्यु की खास पहचान है। यही वजह है कि उसकी विदाई को लेकर महल से लेकर वन विभाग तक भावुक माहौल है। अधिकारियों के मुताबिक, नियमों के अनुसार अभिमन्यु पिछले साल ही सेवानिवृत्त हो चुका है, लेकिन स्थानीय लोगों के आग्रह पर उसे विदाई जुलूस में शामिल होने की अनुमति दी गई है।
विदाई के बाद मथिगोडु हाथी शिविर भेजा जाएगा अभिमन्यु
वन विभाग के डीसीएफ डॉ. आईबी प्रभु गौड़ा के मुताबिक, जंबो सवारी में अभिमन्यु की यह आखिरी भागीदारी होगी। उत्सव के बाद उसे मथिगोडु हाथी शिविर भेज दिया जाएगा, जहां उसकी देखभाल जारी रहेगी।
अभिमन्यु के साथ वर्षों से काम कर रहे महावतों और देखभाल करने वाले कर्मचारियों के लिए भी यह अवसर भावुक करने वाला है। करीब तीन दशक से हौदे की जिम्मेदारी संभाल रहे अकरम, भोजन प्रभारी रंगराज और महावत वसंता का उससे गहरा जुड़ाव है। वसंता के पिता भी पहले अभिमन्यु के महावत रह चुके हैं। अब वसंता मथिगोडु शिविर में भी उसकी देखभाल करेंगे।
क्यों खास है कैप्टन अभिमन्यु?
अभिमन्यु 14 वर्ष की उम्र से वन विभाग की सेवा में है। उसे कर्नाटक के प्रमुख कुमकी हाथियों में गिना जाता है। कुमकी हाथियों को जंगली हाथियों को नियंत्रित करने और वन विभाग के विशेष अभियानों में मदद के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
अभिमन्यु को उसकी ताकत, शांत स्वभाव और अनुशासन के लिए जाना जाता है। ‘ऑपरेशन का बादशाह’ और ‘एके-47’ जैसे उपनामों से पहचाने जाने वाले इस हाथी ने वन विभाग के कई अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, उसने देशभर में 300 से अधिक हिंसक हाथियों और 80 से ज्यादा बाघों तथा तेंदुओं को पकड़ने के अभियानों में मदद की है। इसी वजह से उसे ‘कैप्टन अभिमन्यु’ भी कहा जाता है।
सोने का हौदा उठाने के लिए नए हाथियों की ट्रेनिंग
अभिमन्यु के बाद अब 750 किलो का सोने का हौदा उठाने की जिम्मेदारी किस हाथी को मिलेगी, इस पर तैयारी चल रही है। धनंजय और प्रशांत नाम के हाथियों को इसके लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
प्रशिक्षण के दौरान हाथियों को रेत की बोरियों और लकड़ी से बने हौदे के जरिए अभ्यास कराया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन्हें भारी वजन उठाने और जुलूस के दौरान संतुलन बनाए रखने के लिए तैयार करना है।
आमतौर पर जंबो सवारी में 14 हाथी शामिल होते हैं। इस बार अभिमन्यु समेत 13 हाथियों के जुलूस में हिस्सा लेने की जानकारी दी गई है।
हाथियों को दिया जाता है खास भोजन
मैसूर दशहरा में शामिल होने वाले हाथियों की सेहत और ताकत बनाए रखने के लिए उनके भोजन का विशेष ध्यान रखा जाता है। उनके लिए हरे और लाल चने, चावल, नमक तथा प्याज से तैयार खिचड़ी को करीब आठ घंटे तक पकाया जाता है। इसके बाद इसमें ताजी सब्जियां और फल मिलाकर परोसे जाते हैं।
इस विशेष आहार का उद्देश्य हाथियों को जरूरी पोषण देना और उत्सव के दौरान उनकी शारीरिक क्षमता बनाए रखना है।
अभिमन्यु की विदाई के लिए लिखा गया भावुक गीत
अभिमन्यु की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘विजय कर्नाटक’ के संपादक रमेश उथप्पा ने उसकी विदाई के लिए एक विशेष गीत लिखा है। वह अभिमन्यु पर तीन किताबें भी लिख चुके हैं। जानकारी के मुताबिक, विदाई के दिन यह गीत बजाया जाएगा।
मैसूर दशहरा की जंबो सवारी केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक पहचान का भी हिस्सा है। ऐसे में अभिमन्यु की आखिरी भागीदारी लोगों के लिए यादगार पल बनने वाली है।
पहली बार महिला अधिकारी को मिली अहम जिम्मेदारी
इस बार मैसूर दशहरा की तैयारियों में एक और खास बात सामने आई है। रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर यशमा माचम्मा को हाथियों की टीम और उत्सव से जुड़ी तैयारियों की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
बताया गया है कि दशहरा उत्सव में इस स्तर पर जिम्मेदारी संभालने वाली वह पहली महिला अधिकारी हैं। माचम्मा मैसूर पैलेस में अभिमन्यु और हाथियों की पूरी टीम की अगवानी करेंगी।
21 अक्टूबर तक चलेगा दशहरा उत्सव
मैसूर दशहरा उत्सव 21 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने गुरुवार को जानकारी दी कि इस साल उत्सव में कंबाला और तुलुनाडु की झांकियां भी शामिल होंगी।
इस बार जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम और शाही जुलूस आकर्षण का केंद्र रहेंगे, वहीं अभिमन्यु की विदाई उत्सव की सबसे भावुक यादों में शामिल हो सकती है। 26 साल तक सोने का हौदा उठाने वाला यह हाथी अब शाही सवारी से विदा लेकर अपने बाकी जीवन के लिए मथिगोडु शिविर लौटेगा।

