ओबीसी आंकड़ों के बाद ही होंगे निकाय चुनाव, आरक्षण प्रक्रिया पर अटका फैसला: यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा
राज्य में निकाय चुनावों को लेकर स्थिति एक बार फिर स्पष्ट होती नजर आई है। नगरीय विकास एवं आवास (यूडीएच) मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने साफ कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सटीक और वास्तविक आंकड़े प्राप्त होने के बाद ही राज्य में निकाय चुनाव कराए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरक्षण प्रक्रिया पूरी हुए बिना चुनाव कराना संभव नहीं है।
मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण व्यवस्था पूरी तरह से पारदर्शी, न्यायसंगत और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हो। उन्होंने बताया कि जब तक ओबीसी वर्ग की वास्तविक स्थिति का सही डेटा उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।
इस मुद्दे पर राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि आरक्षण से जुड़ी प्रक्रिया संवैधानिक और कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील है, इसलिए किसी भी प्रकार की जल्दबाजी से बचना जरूरी है। सरकार का मानना है कि गलत या अधूरे आंकड़ों के आधार पर चुनाव कराना भविष्य में कानूनी विवादों को जन्म दे सकता है।
इस बीच, निकाय चुनावों को लेकर मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। बताया जा रहा है कि यह पूरा प्रकरण राजस्थान उच्च न्यायालय में लंबित है, जहां आरक्षण और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सुनवाई चल रही है। अदालत के निर्णय के बाद ही आगे की चुनावी प्रक्रिया पर स्पष्टता आने की संभावना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओबीसी आरक्षण और जनसंख्या आंकड़ों का मुद्दा लंबे समय से राज्य की स्थानीय निकाय चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। इस कारण कई नगर निकायों का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद चुनाव टलते रहे हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, ओबीसी आबादी के सटीक आंकड़े जुटाने के लिए सर्वेक्षण और डेटा संग्रह की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। यह डेटा आने के बाद ही आरक्षण का प्रतिशत तय किया जाएगा और उसी आधार पर निकायों में सीटों का आरक्षण लागू होगा।
वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस रुख पर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि चुनाव में देरी से लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है और जनता को स्थानीय निकायों में चुनी हुई सरकार से वंचित रहना पड़ रहा है। हालांकि सरकार का कहना है कि संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।
स्थानीय स्तर पर भी इस देरी को लेकर असंतोष देखा जा रहा है, क्योंकि नगर निकायों में कई विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। प्रशासक नियुक्त होने के बावजूद निर्णय लेने की गति अपेक्षाकृत धीमी बताई जा रही है।
इस पूरे मामले में अब सभी की निगाहें अदालत के आगामी फैसले और सरकार द्वारा ओबीसी आंकड़ों को लेकर किए जा रहे अंतिम सर्वे पर टिकी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक निकाय चुनावों की तारीख तय होना मुश्किल है।
इस प्रकार, ओबीसी आंकड़ों की सटीकता और आरक्षण प्रक्रिया की वैधानिकता राज्य में निकाय चुनावों की दिशा और समय तय करने में सबसे बड़ा निर्णायक कारक बन गई है।

