मुंबई, जो भारत की आर्थिक राजधानी और व्यापार की नगरी है, अब सुरक्षा के मामले में भी नया इतिहास रच रही है। पिछले कई सालों में शहर ने आतंकवादी हमलों, बम धमाकों और उच्चस्तरीय अपराधों का सामना किया है, जिसने आम नागरिकों में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा की थी। ऐसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में आने के बाद ‘राष्ट्र-प्रथम’ और ‘जीरो-टॉलरेंस’ पॉलिसी को अपने नीतिगत एजेंडे की प्राथमिकता बनाया है।
इस नीति का आधार यह रहा है कि न केवल बाहरी खतरों का सामना किया जाए, बल्कि आंतरिक सुरक्षा ढांचे को भी मजबूत किया जाए। भाजपा की सरकार का कहना है कि आतंकवाद, कट्टरता और अवैध गतिविधियों के प्रति शून्य सहिष्णुता से ही महानगर को भयमुक्त बनाया जा सकता है। इसके तहत सुरक्षा तंत्र को आधुनिक बनाने, अधिक निगरानी और कड़े कानून प्रवर्तन को लागू करने जैसी कई महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं।
बीते कुछ दशकों में मुंबई ने कई भयावह घटनाएँ देखी हैं। 1993 के सिलसिलेवार बम धमाके हों या 26/11 के आतंकवादी हमले, इन घटनाओं ने शहरवासियों के मन में सुरक्षा को लेकर सदाबहार सवाल उठाए। भाजपा पक्ष का आरोप है कि तत्कालीन राज्य और केंद्र सरकारों की ढ़िलमुल नीतियों के कारण सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिरा और शहर को प्रभावी सुरक्षा नहीं मिल पाई थी। लेकिन 2014 के बाद से स्थिति में काफी बदलाव आया है।
भाजपा की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत सीसीटीवी नेटवर्क का विस्तार, तटीय सुरक्षा के उपायों को मजबूत करना, खुफिया तंत्र को पुनर्गठित करना और अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई बढ़ाना शामिल है। इसके अलावा, अवैध प्रवासियों और घुसपैठ के मुद्दों पर भी पार्टी ने सख्ती से कदम उठाए हैं। पार्टी का दावा है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों से जुड़ी कई समस्याएं जैसे जनसंख्या संतुलन में बदलाव, अपराध में वृद्धि और सामाजिक तनाव, सुरक्षा चुनौतियों को बढ़ा रहे थे। इसलिए इस दिशा में भी प्रशासनिक कदम उठाए गए।
भाजपा के समर्थकों का कहना है कि कानून का शासन लागू करने के लिए कठोर निर्णय लेना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर, अफजल खान की कब्र के आसपास हुए अवैध निर्माण को हटाना और अन्य अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई करना इसी नीति का हिस्सा बताया गया है। इन कार्रवाइयों से स्पष्ट संदेश दिया गया कि कानून के आगे किसी को नहीं छोड़ा जाएगा।
दूसरी ओर राजनीतिक विरोधी यह कहते हैं कि सुरक्षा मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे सत्ता में बैठे लोग राजनीतिक लाभ हासिल करना चाहते हैं। वे आरोप लगाते हैं कि कभी-कभी सुरक्षा की आड़ में मानवाधिकारों और नागरिक आज़ादियों को सीमित करने जैसे कदम उठाए जाते हैं।
आज के समय में मुंबई के त्योहार, जन-आकर्षण वाले कार्यक्रम और रोजमर्रा की जिंदगी अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से होती दिखाई देती है। सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और कड़ी निगरानी ने एक सकारात्मक माहौल बनाए रखा है। आम नागरिक अब रात देर तक भी घर लौटते समय पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं।
भाजपा की ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति ने निश्चित रूप से मुंबई की सुरक्षा संरचना को नई दिशा दी है। हालांकि आलोचना और समर्थन दोनों ही जारी हैं, यह स्पष्ट है कि सुरक्षा को सुधारने की यह दिशा आगे भी शहर की राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का मुख्य विषय बनी रहेगी।

