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मुंबई की पहचान बदलने की साज़िश: क्या यह ‘वोट बैंक’ राजनीति है या शहर पर कब्ज़ा 

uddhav

मुंबई — देश की आर्थिक राजधानी इन दिनों राजनीतिक विवादों के केंद्र में बनी हुई है। जैसे-जैसे बीएमसी चुनाव और अन्य राजनीतिक टकराव सामने आ रहे हैं, शहर की जनसांख्यिकीय संरचना को लेकर विवाद भी तेज़ हो गया है। महाविकास आघाड़ी (MVA) पर आरोप लग रहे हैं कि उसकी नीतियों से मुंबई में एक विशेष समुदाय का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे शहर की पारंपरिक पहचान धूमिल हो सकती है। विपक्षी दलों का कहना है कि यह सिर्फ़ विकास की राजनीति नहीं, बल्कि साज़िश के तौर पर वोट बैंक तैयार करने और सत्ता पर कब्जा करने की रणनीति है।मुंबई के बेहरामपाड़ा, मालवणी और कुर्ला जैसे इलाकों में वर्षों से फैली अनधिकृत बस्तियों को लेकर बहस चल रही है। आलोचक दावा करते हैं कि महाविकास आघाड़ी सरकार ने इन बस्तियों को ‘झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास’ के नाम पर वैध बनाने का निर्णय लिया है, जिससे उनमें रहने वाले लोगों को वोटिंग और अन्य सुविधाओं का लाभ मिल सके। उनका कहना है कि यह कदम सिर्फ़ प्रशासनिक सुधार का नाम लेता है, लेकिन असल में यह शहर में एक बड़े वोट बैंक को तैयार करने की चतुर योजना हो सकती है।

मराठी पहचान का संघर्ष, मुंबई की राजनीति का एक पुराना मुद्दा रहा है। अब इसका नया रूप सामने आया है, जहां आरोप है कि उद्धव ठाकरे (UBT) गुट की नीतियों से मराठी समुदाय का शहर में प्रभाव कम हो रहा है और दूसरी ओर कुछ समुदायों की संख्या बढ़ रही है। कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि विदेश से आए अप्रवासियों जैसे बांग्लादेशी और रोहिंग्या समुदायों को स्थानीय सुविधाएं देने की अनुमति देकर उनकी संख्या में वृद्धि को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे पारंपरिक सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है और भविष्य में चुनावी नतीजों पर इसका असर हो सकता है। राजनीतिक तापमान तब और बढ़ गया जब महापौर पद पर मुस्लिम चेहरे के नाम पर बहस तेज़ हो गई। एक गुट इसे समावेशी राजनीति का संकेत मान रहा है, जबकि दूसरे इसे तुष्टीकरण की राजनीति करार दे रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि इससे शहर की सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, और यह सिर्फ़ एक राजनीतिक चाल है ताकि कुछ समुदायों को जोड़कर सत्ता में बने रहने की कोशिश की जा सके।विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा सिर्फ़ मुंबई तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया मोड़ ला रहा है। जहां एक तरफ हिंदू मतदाताओं के बीच विभाजन पैदा किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों को एकजुट करने की कोशिशें तेज़ हैं। इस रणनीति से राजनीतिक दल सत्ता का लाभ उठाना चाहते हैं, लेकिन इससे समाजिक सद्भाव और शहर की स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

अब सवाल यह है कि मुंबई अपने मूल स्वरूप को बचा पाएगा या नहीं। क्या मतदाता विकास-उन्मुख राजनीति को प्राथमिकता देंगे या ऐसी राजनीति का विरोध करेंगे जो शहर की मूल पहचान को बदल सकती है? आम जनता और राजनैतिक दलों के बीच यह बहस गली-गली में छिड़ चुकी है, और आने वाले समय में यह तय करेगा कि मुंबई की दिशा क्या होगी — विकास की राह या सत्ता-केन्द्रित वोट बैंक राजनीति की ओर।

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