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मोटरसाइकिल के बदले आधा पाकिस्तान! जब 1971 की जंग में सैम मानेकशॉ ने किया हिसाब बराबर

नई दिल्ली, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। हिंदुस्तान के एक ताकतवर और मजबूत सेना प्रमुख, जिन्होंने पाकिस्तान को इतनी करारी शिकस्त दी थी कि अगले कुछ दशक आवाज तक नहीं निकाल पाया। अटूट नेतृत्व क्षमता और प्रेरणादायी साहस वाले इस लीडर की ही ताकत थी, जिसने 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को बंदी बना लिया था और इस मुल्क को दो हिस्सों में बांटकर बांग्लादेश बनाया। बात हो रही है भारत के महान सैन्य अधिकारी फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की।
मोटरसाइकिल के बदले आधा पाकिस्तान! जब 1971 की जंग में सैम मानेकशॉ ने किया हिसाब बराबर

नई दिल्ली, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। हिंदुस्तान के एक ताकतवर और मजबूत सेना प्रमुख, जिन्होंने पाकिस्तान को इतनी करारी शिकस्त दी थी कि अगले कुछ दशक आवाज तक नहीं निकाल पाया। अटूट नेतृत्व क्षमता और प्रेरणादायी साहस वाले इस लीडर की ही ताकत थी, जिसने 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों को बंदी बना लिया था और इस मुल्क को दो हिस्सों में बांटकर बांग्लादेश बनाया। बात हो रही है भारत के महान सैन्य अधिकारी फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की।

3 अप्रैल 1914 को पंजाब के अमृतसर में जन्मे सैम मानेकशॉ का पूरा नाम 'सैम होरमूजजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ' था। फौज से लेकर उनके दोस्त और परिवार के सदस्य उन्हें या तो सैम पुकारते थे या 'सैम बहादुर'।

"इस देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी है। आपको लड़ना होगा, जीतने के लिए लड़ना होगा। हारने के लिए यहां कोई जगह नहीं है। अगर हारे तो वापस आने की जरूरत नहीं। हार देश का अपमान होगा।"

सैम मानेकशॉ के ये जोशीले शब्द उनकी अटूट नेतृत्व क्षमता और दृढ़ संकल्प को दर्शाते हैं। उनमें न सिर्फ देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी, बल्कि अपने सैनिकों में जीत का जज्बा भर देने की अद्भुत क्षमता भी थी। वे अपनी ताकत और साहस को पहले भी दिखा चुके थे, लेकिन 1971 में उन्हें फिर से एक अवसर मिला, जिसमें सैम मानेकशॉ ने जीत भारत के नाम कराई।

पिता की तरह डॉक्टर बनने का सपना था। उम्र अभी कम थी, लेकिन जुनून भरपूर था और इसीलिए उन्होंने पिता के सामने अपनी इच्छा रख दी, मगर पिता ने उम्र का हवाला देते हुए लंदन में मेडिकल की पढ़ाई करने से इनकार कर दिया था।

मायूस जरूर थे, लेकिन अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज में पढ़ाई करते हुए किस्मत उनकी जिंदगी को नई दिशा दे रही थी। 1932 में आईएमए में अफसरों की भर्ती के लिए आवेदन आए थे। इस बार सैम अपने पिता की बात न मानते हुए सेना में जाने का मन बना चुके थे। वे आईएमए में सिलेक्ट हुए और कड़ी ट्रेनिंग के बाद लाहौर में ड्यूटी पर जा चढ़े। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वे अपने पराक्रम और बहादुरी का उदाहरण पेश कर चुके थे।

उनकी शरारतों और मजाक के कई किस्से आज भी मशहूर हैं। कुछ इसी तरह का एक किस्सा साल 1942 का है, जब दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वर्मा की लड़ाई में जापानी सैनिकों की 9 गोलियों को उन्होंने अपने शरीर पर झेला था। हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर ने उनके पेट में लगी गंभीर चोटों और उनके बचने की बहुत कम संभावना को देखते हुए उनका इलाज करने से मना कर दिया था।

किसी तरह उनकी सांसें चल रही थी। बाद में जब सर्जरी शुरू हुई थी, तब पता चला था कि शरीर के कई अंग बुरी तरह जख्मी हो चुके थे। इसी कारण उन्हें होश में आने में कई घंटे लग चुके थे। जब सैम मानेकशॉ को होश आया, तो सर्जन ने पूछा, "तुम्हें क्या हुआ है, नौजवान?" और घायल मानेकशॉ ने जवाब दिया, "कुछ नहीं, बस किसी गधे ने मुझे लात मार दी।"

इतने भयानक दर्द को भी हंसी में उड़ा देने वाले यह सैम मानेकशॉ ही थे।

उनकी जिंदगी का एक किस्सा यह भी है कि बड़ी-बड़ी मूंछों वाले सैम अपने बच्चों के साथ खूब शरारत किया करते थे। वे बच्चों को खूब परेशान किया करते थे। इस बारे में उनकी बेटी माया दारूवाला ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था।

उन्होंने सिर्फ एक युद्ध नहीं जीता था, बल्कि आधा पाकिस्तान अलग कर दिया था। इसमें भी दिलचस्प किस्सा उनकी मोटरसाइकिल का भी है। कभी एक समय दोस्त बनकर रहने वाले पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति यहया खान को सैम की मोटरसाइकिल पसंद थी, क्योंकि हिंदुस्तान के बंटवारे से पहले दोनों एक ही फौज में हुआ करते थे, तो दोस्ती पक्की बन चुकी थी।

जब देश का बंटवारा हुआ तो यहया खान ने पाकिस्तान की फौज में जाने का फैसला लिया था। मानेकशॉ के पास भी पाकिस्तान जाने का एक अवसर था, क्योंकि वे पारसी समुदाय से आते थे और अन्य पारसी की तरह उन्हें पाकिस्तान में बसने का अवसर मिला था। दूसरी बात यह भी कि देश विभाजन के दौरान सेना भी बंट चुकी थी, जो 12वीं फ्रंटियर फोर्स राइफल्स में मानेकशॉ थे, वह पाकिस्तान के हिस्से जा चुकी थी। इसके बावजूद, मानेकशॉ ने भारत को चुना, क्योंकि उनका दिल हिंदुस्तान के लिए धड़कता था।

देश विभाजन के समय मानेकशॉ ने अपनी मोटरसाइकिल एक हजार रुपए में यहया खान को बेच दी, लेकिन उसका पैसा बकाया था। यहया खान यह कहकर मोटरसाइकिल ले गए कि वह पैसे भिजवा देंगे, लेकिन ढाई दशक तक वह पैसा नहीं आया। हालांकि, जब भारत-पाकिस्तान की लड़ाई हुई तो मानेकशॉ और यहया खान अपने-अपने देश की सेना के प्रमुख थे। इस लड़ाई में भारत विजयी हुआ। सैम मानेकशॉ ने जीत के बाद कहा था, "मैंने यहया खान के चेक का 24 सालों तक इंतजार किया, लेकिन वह कभी नहीं आया। आखिर उन्होंने 1947 में लिया गया उधार अपना आधा देश देकर चुकाया।"

सैम मानेकशॉ निडर और बेखौफ थे। इसीलिए जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रही थीं, तब वे उनकी बात काटने में भी नहीं डरते थे। 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वे मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई करें, लेकिन सैम मानेकशॉ ने ऐसा करने से इनकार किया, क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी।

भले इंदिरा गांधी इस बात से नाराज थीं, लेकिन मानेकशॉ अपनी तैयारी से भली भांति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने इंदिरा गांधी को जीत की गारंटी देते हुए समय मांग लिया था। इसी तैयारी का नतीजा था कि भारतीय फौज ने 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था।

--आईएएनएस

डीसीएच/डीएससी

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