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10% से ज्यादा स्कूली बच्चे नशे के शिकार! क्या 2029 तक भारत को नशामुक्त बना पाएगी सरकार?  

10% से ज्यादा स्कूली बच्चे नशे के शिकार! क्या 2029 तक भारत को नशामुक्त बना पाएगी सरकार?  

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 6 सितंबर 2026 को गोवा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बड़ा ऐलान किया। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य 2029 तक भारत को नशामुक्त बनाना है। शाह ने ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई को देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताते हुए कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ अभियान के बाद अब नशे के खिलाफ एक बड़े राष्ट्रीय अभियान पर जोर दिया जाएगा।

इसके लिए जुलाई 2026 से जुलाई 2029 तक का तीन साल का रोडमैप तैयार किया गया है। सरकार के मुताबिक इस अवधि में अभियान मिशन मोड में चलाया जाएगा। हर लक्ष्य के लिए समयसीमा तय होगी, संबंधित मंत्रालय और एजेंसियों की जिम्मेदारी निर्धारित की जाएगी और हासिल किए गए परिणामों की हर तिमाही समीक्षा की जाएगी।

लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या 2029 तक भारत को वास्तव में नशामुक्त करना संभव होगा?

भारत में नशे की समस्या कितनी बड़ी है?

भारत में नशीले पदार्थों का इस्तेमाल लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GMCH) की डीन डॉ. राज गजभिए के मुताबिक, देश में करीब 25 करोड़ लोग किसी न किसी तरह के नशे का इस्तेमाल करते हैं, जबकि आधिकारिक आंकड़ा करीब 10 करोड़ बताया जाता है।

उनके मुताबिक, करीब 4 करोड़ से ज्यादा लोग नशे पर निर्भरता की स्थिति में हैं। इसे उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति जैसी गंभीर समस्या बताया।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) से जुड़े आंकड़ों के अनुसार:

  • कैनबिस यानी गांजा/चरस: करीब 3.1 करोड़ लोग इसका इस्तेमाल करते हैं।
  • ओपिओइड यानी अफीम/हेरोइन आदि: करीब 2.26 करोड़ लोग इसके इस्तेमाल से जुड़े हैं।
  • करीब 60 लाख लोगों को ओपिओइड की लत के लिए इलाज की जरूरत बताई गई है।

ये आंकड़े बताते हैं कि नशे की समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध स्वास्थ्य और समाज से भी है।

हर 10 में से करीब एक स्कूली किशोर नशे के संपर्क में?

नशे की समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू इसका युवाओं और किशोरों तक पहुंचना है। AIIMS के नेतृत्व में हुए एक सर्वे के मुताबिक, 10.3% स्कूली किशोरों ने पिछले एक साल में साइकोएक्टिव पदार्थों के इस्तेमाल की बात कही।

सर्वे में 15.1% किशोरों ने बताया कि उन्होंने जिंदगी में कभी न कभी किसी नशीले या साइकोएक्टिव पदार्थ को आजमाया है, जबकि 7.2% ने पिछले एक महीने में इसके इस्तेमाल की जानकारी दी।

यानी बच्चों और किशोरों में नशे की पहुंच को रोकना सरकार के लिए 2029 के लक्ष्य की दिशा में सबसे अहम चुनौतियों में से एक होगा।

नशे से अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर

नशे का असर केवल व्यक्ति और उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था, कानून-व्यवस्था, उत्पादकता और अर्थव्यवस्था पर भी दबाव पड़ता है।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, समय से पहले होने वाली मौतों और दुर्घटनाओं के कारण भारत को हर साल GDP का करीब 1.45% तक नुकसान होने का अनुमान है। वहीं नशे से जुड़े व्यापक आर्थिक नुकसान का अनुमान GDP के 2.5% से ज्यादा तक बताया गया है, जो करीब ₹1.60 लाख करोड़ सालाना के बराबर हो सकता है।

पंजाब की स्थिति भी गंभीर बताई गई है। अनुमान के मुताबिक, राज्य हर साल अपनी GSDP का करीब 2.2% हिस्सा नशे से जुड़े नुकसान की वजह से गंवा रहा है। इसमें इलाज, कानून-व्यवस्था, पुनर्वास, काम से अनुपस्थिति, कम उत्पादकता और समय से पहले होने वाली मौतों का असर शामिल है।

वहीं एक अनुमान के मुताबिक, देश में नशे का अवैध कारोबार करीब ₹20 लाख करोड़ सालाना तक हो सकता है।

भारत में ड्रग्स पहुंचने के प्रमुख रास्ते कौन से हैं?

भारत की भौगोलिक स्थिति भी ड्रग्स तस्करी के लिहाज से चुनौतीपूर्ण है। देश के आसपास ऐसे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र हैं जहां से नशीले पदार्थों की तस्करी के रास्ते जुड़े हुए हैं।

भारत 'गोल्डन ट्राएंगल' यानी म्यांमार, थाईलैंड और लाओस तथा 'गोल्डन क्रेसेंट' यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान से जुड़े ड्रग तस्करी नेटवर्क के प्रभाव वाले क्षेत्र के बीच स्थित है।

इन रास्तों से हेरोइन, मेथामफेटामाइन और अन्य नशीले पदार्थों की तस्करी की जाती है।

पंजाब में ड्रोन तस्करी बड़ी चुनौती

NCB के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में देश में जब्त की गई कुल हेरोइन का करीब 58% यानी 2,086 किलोग्राम हिस्सा पकड़ा गया।

ड्रोन के जरिए ड्रग्स की तस्करी भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। 2025 में 305 ड्रोन-आधारित ड्रग तस्करी के मामले दर्ज हुए, जिनमें 298 मामले पंजाब से जुड़े थे।

यानी कुल मामलों में पंजाब की हिस्सेदारी 97% से ज्यादा रही। आंकड़ों के मुताबिक, 2021 की तुलना में ड्रोन से जुड़े मामलों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है।

फार्मास्युटिकल ड्रग्स भी बन रही बड़ी समस्या

ड्रग्स की चुनौती अब केवल हेरोइन, गांजा या अन्य पारंपरिक नशीले पदार्थों तक सीमित नहीं है। कोडीन आधारित कफ सिरप, ट्रामाडोल, ब्यूप्रेनोर्फिन और अल्प्राजोलम जैसी फार्मास्युटिकल दवाओं का दुरुपयोग भी चिंता का विषय बन रहा है।

दिए गए NCB आंकड़ों के अनुसार, 2025 में फार्मास्युटिकल दवाएं NCB द्वारा जब्त की गई कुल दवाओं का करीब 75% थीं।

सभी ड्रग लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसियों ने 2025 में करीब 2,37,390 किलोग्राम फार्मास्युटिकल दवाएं जब्त कीं। यह आंकड़ा 2021 की तुलना में करीब 77% अधिक बताया गया है।

पंजाब में ही 2025 के दौरान करीब 8.95 लाख बोतल कोडीन आधारित कफ सिरप जब्त की गईं।

तस्करी का तरीका भी बदल रहा है

NCB के मुताबिक, ड्रग तस्करी का तरीका भी बदल रहा है। अब बड़े कंसाइनमेंट की जगह तस्कर छोटे-छोटे कंसाइनमेंट के जरिए सप्लाई नेटवर्क चलाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसे 'डीसेंट्रलाइज्ड सप्लाई मैकेनिज्म' की ओर बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। छोटे कंसाइनमेंट की वजह से बड़ी मात्रा में ड्रग्स की जब्ती मुश्किल हो सकती है, लेकिन दूसरी तरफ मामलों और गिरफ्तारियों में वृद्धि हुई है।

2025 में करीब 1,48,063 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या 96,930 थी। इसी तरह 2025 में 1,83,675 गिरफ्तारियां हुईं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 1,22,224 था।

2029 तक नशामुक्त भारत के सामने 4 बड़ी चुनौतियां

1. फार्मास्युटिकल ड्रग्स पर नियंत्रण

भारत दुनिया के बड़े दवा उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में नशीली या दुरुपयोग की संभावना वाली दवाओं की अवैध बिक्री और गलत इस्तेमाल पर निगरानी रखना बड़ी चुनौती है।

प्रिस्क्रिप्शन वाली दवाओं की उपलब्धता, मेडिकल स्टोर्स पर निगरानी और सीमित संख्या में ड्रग इंस्पेक्टर्स जैसी समस्याएं इस चुनौती को और गंभीर बना सकती हैं।

2. Darknet, Cryptocurrency और Drone

ड्रग तस्कर लगातार तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। Darknet पर ऑर्डर, Cryptocurrency के जरिए भुगतान और ड्रोन से सीमापार ड्रग्स पहुंचाने जैसे तरीके जांच एजेंसियों के लिए नई चुनौती बन चुके हैं।

NCB ने 2021 से 2025 के बीच Darknet से जुड़े 110 मामले दर्ज किए हैं। ऐसे मामलों में पारंपरिक जांच के साथ साइबर और डिजिटल फॉरेंसिक क्षमता की भी जरूरत पड़ती है।

3. जेलों से चल रहे ड्रग नेटवर्क

जेलों के अंदर से ड्रग तस्करी के नेटवर्क चलने की आशंका भी एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है। जेल के भीतर से नेटवर्क संचालित होने और बाहर सप्लाई जारी रहने की स्थिति में केवल बाहरी तस्करी रोकना पर्याप्त नहीं होगा।

4. जांच एजेंसियों पर बढ़ता दबाव

जब एक साल में ही करीब 1.48 लाख ड्रग्स से जुड़े मामले दर्ज हो रहे हों, तो उनकी जांच, आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और दोषियों को सजा दिलाना बड़ी चुनौती बन जाता है।

सरकार को नशे की सप्लाई रोकने के साथ-साथ नशे के आदी लोगों के इलाज, पुनर्वास और समाज में उनकी वापसी पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

तो क्या 2029 तक नशामुक्त हो पाएगा भारत?

सरकार ने 2029 का लक्ष्य जरूर तय कर दिया है, लेकिन इसे हासिल करना आसान नहीं होगा। ड्रग तस्करी के पारंपरिक रास्तों के साथ-साथ अब फार्मास्युटिकल दवाओं का दुरुपयोग, ड्रोन, Darknet और Cryptocurrency जैसे नए तरीके भी सामने आ रहे हैं।

इसलिए नशामुक्त भारत के लक्ष्य के लिए केवल तस्करों की गिरफ्तारी या ड्रग्स की जब्ती पर्याप्त नहीं होगी। सप्लाई रोकने के साथ डिमांड कम करना, युवाओं में जागरूकता बढ़ाना, नशामुक्ति केंद्रों को मजबूत करना, समय पर इलाज और पुनर्वास की व्यवस्था करना भी उतना ही जरूरी होगा।

2029 का लक्ष्य कितना सफल होता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले तीन वर्षों में सरकार अपने तय रोडमैप को जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू कर पाती है।

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