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मोहन भागवत ने स्व-बोध और पंच परिवर्तन पर दिया जोर, बोले- विवेक के अभाव में नशे की शिकार हो रही नई पीढ़ी

मोहन भागवत ने स्व-बोध और पंच परिवर्तन पर दिया जोर, बोले- विवेक के अभाव में नशे की शिकार हो रही नई पीढ़ी
मोहन भागवत ने स्व-बोध और पंच परिवर्तन पर दिया जोर, बोले- विवेक के अभाव में नशे की शिकार हो रही नई पीढ़ी

नागपुर, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत शताब्दी वर्ष श्री विजयादशमी उत्सव के लिए नागपुर पहुंचे। नागपुर में श्री विजयादशमी उत्सव की शुरुआत स्वयंसेवकों के पथ संचलन के साथ हुई। इस उत्सव में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद रहे और उन्होंने उत्सव में हिस्सा लिया।

संबोधन में डॉ. मोहन भागवत ने कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा कि स्व के आत्मबोध को समाज में स्वदेशी मेलों के द्वारा जागृत करने का प्रयास करने वाले 'हिंदू मेला' के प्रेरक और प्रवर्तक, बंग भूमि के स्वर्गीय राज नारायण बसु के जन्म का 200वां वर्ष चल रहा है।

सरसंघचालक ने कहा कि हमें अपनी विस्मृति को दूर कर उस तत्व को भी स्पष्ट रूप से समझना पड़ेगा, स्वीकार करना पड़ेगा और उसके अनुरूप गुणवत्तापूर्ण जीवन का सभी आयामों में निर्माण करना पड़ेगा। देश की स्वाधीनता के लिए जितनी तपस्या और समर्पण हुआ, उससे कहीं अधिक की आवश्यकता अब पड़ेगी, परिस्थिति को देखते हुए यह ध्यान में आता है।

उन्होंने पंच परिवर्तन की बात करते हुए कहा कि पंच परिवर्तन की पांचों पहलों का (समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व बोध व स्वदेशी और नागरिक अनुशासन) समाज के सभी वर्गों और स्तरों में स्वागत हुआ है। विश्व के अन्य देशों में भी इसकी आवश्यकता अनुभव की गई है। यह केवल एक वर्ष भर का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन में आचरण का परिवर्तन लाने वाली व्यवहार की शैली है।

डॉ. भागवत ने नई पीढ़ी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विभिन्न माध्यमों से प्राप्त जानकारी बिना उचित-अनुचित का विवेक किए नई पीढ़ी ग्रहण करती है। उसके दुष्परिणामों का अनुभव होने के बाद विभिन्न देशों ने कुछ अनुशासन और प्रतिबंध लागू किए हैं। हमारे अपने देश में भी इस प्रकार की आवश्यकता, विशेष तौर पर 'ओटीटी प्लेटफॉर्म' को लेकर, समाज में अनुभव की जा रही है। शासन-प्रशासन को इसका विचार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि विवेक के अभाव में ही विश्वभर में नई पीढ़ी नशीली दवाओं की आदत की शिकार हो रही है। नशा एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है और उसके परिहार के लिए समय रहते शासन-प्रशासन और समाज को प्रयास शुरू करने चाहिए। समाज की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को यह विवेक नई पीढ़ी को देना पड़ेगा।

सरसंघचालक ने संतुलित और समग्र विकास की दृष्टि पर भी बात की। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक की प्रगति मनुष्यों को भौतिक दृष्टि से सुखी जीवन जीने में, जीवन में ज्ञान और तर्क के आधार पर अपने व्यवहार को निर्दोष करने में मदद करती है। पर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तकनीक केवल साधन है। केवल उपभोगवादी या जड़वादी दृष्टिकोण से विकास होता है तो सुख-सुविधा के साथ उससे बड़ी हानि मोल लेनी पड़ती है।

उन्होंने नेपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि नेपाल में जिस भयंकर त्रासदी को झेलना पड़ा, हजारों मनुष्यों की जान चली गई, उसके मूल में कहीं न कहीं संपूर्ण हिमालय क्षेत्र में, जो भारत, तिब्बत, भूटान, चीन जैसे अनेक देशों से गुजरता है, में चले एकांगी विकास का परिणाम है। ऐसे में विकास की समग्र और संतुलित दृष्टि का निर्माण होना आवश्यक है।

--आईएएनएस

वीकेयू/एएस

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