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मॉडलिंग से लेकर फिल्म निर्माण तक, गंभीर अभिनय निभाकर भी संजय सूरी को नहीं मिला मुकाम

मुंबई, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। कश्मीर से निकलकर, संघर्ष और संकल्प की एक ऐसी कहानी है, जो न केवल पर्दे पर, बल्कि वास्तविक जीवन में भी उतनी ही प्रभावशाली है, यह कहानी है अभिनेता संजय सूरी की।
मॉडलिंग से लेकर फिल्म निर्माण तक, गंभीर अभिनय निभाकर भी संजय सूरी को नहीं मिला मुकाम

मुंबई, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। कश्मीर से निकलकर, संघर्ष और संकल्प की एक ऐसी कहानी है, जो न केवल पर्दे पर, बल्कि वास्तविक जीवन में भी उतनी ही प्रभावशाली है, यह कहानी है अभिनेता संजय सूरी की।

संजय सूरी अपने समय के ऐसे अभिनेता रहे, जिन्होंने उन संवेदनशील किरदारों को निभाने के लिए 'हां' कहा, जिसे दूसरे अभिनेता करने से कतराते थे। अभिनेता 6 अप्रैल को 55वां जन्मदिन मना रहे हैं।

कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे संजय सूरी ने बचपन में वो दर्द झेला, जो किसी अन्य बच्चे के लिए मुश्किल होता है। छोटी उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया। उनके पिता को आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था, और यही कारण था कि अभिनेता का परिवार कश्मीर छोड़कर दिल्ली शिफ्ट हो गया।

संजय ने कभी नहीं सोचा था कि वो फिल्मों में काम करेंगे। वह स्पोर्ट्स में करियर बनाना चाहते थे। मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखने से पहले अभिनेता कभी एक मशहूर स्क्वैश खिलाड़ी हुआ करते थे। लेकिन, कहते हैं न कि भाग्य में जो लिखा होता है, वही होता है।

संजय ने मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा और विज्ञापन में दिखने लगे। रिया सेन के साथ उनका निरमा साबुन का विज्ञापन काफी पॉपुलर हुआ था। इसी विज्ञापन ने अभिनेता की किस्मत चमका दी और उन्होंने पहली फिल्म 'प्यार में कभी-कभी' से फिल्मी दुनिया में कदम रखा। इस फिल्म में दिग्गज अभिनेता राजेश खन्ना की बेटी रिंकी खन्ना और डिनो मोरिया मौजूद थे। फिल्म फ्लॉप रही, लेकिन अभिनेता को सपोर्टिंग किरदार के साथ कई फिल्में मिलीं। उन्होंने 'दामन', 'फिलहाल', 'दिल विल प्यार व्यार', 'पिंजर' जैसी फिल्मों में काम किया, लेकिन असल पहचान साल 2003 में आई 'झंकार बीट्स' से मिली थी। इस फिल्म में अभिनेता का किरदार बहुत संजीदा और गंभीर था।

साल 2005 में अभिनेता की फिल्म 'माई ब्रदर... निखिल' ने समाज में नई बहस को जन्म दिया। जहां देश में एचआईवी और एलजीबीटीक्यू को लेकर दबी आवाज में बात हो रही थी, वहीं फिल्म के साथ एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों को लेकर बहस छिड़ गई। इतनी गंभीर फिल्मों और बेहतरीन अभिनय के बाद भी उनका करियर औसत रहा और जो पहचान उन्हें मिलनी चाहिए थी, वो नहीं मिली।

एक्टिंग छोड़कर अभिनेता ने फिल्मों का निर्माण करना शुरू किया। उनकी पहली फिल्म 'आई एम' को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। इसके साथ ही उन्होंने 'चौरांगा' नाम की फिल्म का भी निर्माण किया था। आज वे ओटीटी पर भी सक्रिय हैं और खुद का एंटीक्लॉक फिल्म्स का प्रोडक्शन हाउस भी चलाते हैं।

--आईएएनएस

पीएस/एबीएम

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