एमएफ हुसैन बर्थडे स्पेशल : नंगे पैर घूमने वाले मकबूल, एक कवि से जुड़ा किस्सा
मुंबई, 16 सितंबर (आईएएनएस)। मकबूल फिदा हुसैन का नाम आते ही एक ऐसे कलाकार की तस्वीर सामने आती है, जिसने अपनी पेंटिंग्स से भारतीय कला को दुनिया के सामने एक अलग अंदाज में पेश किया। लंबा कद, हाथ में ब्रश, चेहरे पर सफेद दाढ़ी और पैरों में जूते नहीं... हुसैन का यह अंदाज भी उनकी पहचान बन गया था।
उनके नंगे पैर चलने के पीछे एक बड़ी वजह थी। इसके पीछे एक कवि के लिए उनका सम्मान था। हुसैन ने खुद बताया था कि एक कवि के अंतिम संस्कार से लौटते समय उन्होंने अपने जूते उतार दिए थे और फिर लंबे समय तक उन्हें दोबारा पहना ही नहीं।
हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था। उनका बचपन इंदौर में बीता। बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया था। इस कमी का असर उनकी जिंदगी पर लंबे समय तक रहा। आगे चलकर वह अपनी कला में महिलाओं और मां की छवि को भी अलग नजर से देखने लगे।
हुसैन ने एक बातचीत में बताया था कि जब वह काफी छोटे थे, उस वक्त उनकी मां का देहांत हो गया था, इसलिए उन्हें मां से जुड़ी यादें साफ-साफ याद नहीं हैं।
कला की तरफ उनका रुझान बचपन से था। वह अपने इस हुनर से कमाई करने का रास्ता तलाशने लगे। 1930 के दशक में उन्होंने मुंबई में फिल्मों के होर्डिंग और पोस्टर पेंट करने शुरू किए। उस दौर में बड़े-बड़े फिल्मी पोस्टर हाथ से बनाए जाते थे और हुसैन भी इसी काम के जरिए अपना गुजारा करते थे।
1947 में हुसैन उन कलाकारों में शामिल हुए, जिन्होंने प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप बनाया। इस ग्रुप का मकसद भारतीय कला को नए तरीके से देखने और आधुनिक कला के साथ जोड़ना था। हुसैन की पेंटिंग्स में भारतीय संस्कृति, आम जिंदगी, धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों के साथ आधुनिक कला की शैली दिखाई देने लगी। धीरे-धीरे उनकी पहचान देश से बाहर भी बनने लगी। 1950 और 1960 के दशक में उनकी पेंटिंग्स प्रदर्शनी भारत के साथ-साथ विदेशों में भी लगीं। उनकी पेंटिंग को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला और 1959 में टोक्यो बिएनाले में भी उन्हें पुरस्कार मिला।
हुसैन की जिंदगी में उनके नंगे पैर चलना लोगों के लिए एक बड़ा सवाल था। हिंदी के मशहूर कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन के बाद हुसैन उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए। हुसैन कविता को बहुत पसंद करते थे और मुक्तिबोध को महान कवि मानते थे। बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का दुख हुआ कि इतने बड़े कवि को जीवन में वह पहचान नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे। इसी भावना में उन्होंने अपने जूते उतार दिए और मई की गर्मी में तारकोल की सड़क पर नंगे पैर चल पड़े। उन्होंने इसे मुक्तिबोध के दर्द को महसूस करने की अपनी कोशिश बताया था।
हुसैन सिर्फ पेंटिंग तक सीमित नहीं रहे। सिनेमा के प्रति उनका पुराना लगाव उन्हें फिल्मों तक भी ले गया। 1967 में उन्होंने 'थ्रू द ऑईज ऑफ ए पेंटर' नाम की फिल्म बनाई। इस फिल्म में उन्होंने राजस्थान के रंग, लोगों और वहां के जीवन को अपने नजरिए से दिखाया। फिल्म को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर मिला। इसके बाद उन्होंने 'गजगामिनी' और 'मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज' जैसी फिल्में भी बनाईं।
कला की दुनिया में उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें 1966 में पद्म श्री, 1973 में पद्म भूषण और 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वह 1971 में पाब्लो पिकासो के साथ साओ पाउलो बिएनाले में भी आमंत्रित किए गए थे। घोड़ों की उनकी पेंटिंग्स खास तौर पर बहुत मशहूर हुईं। लेकिन उनकी कला को लेकर विवाद भी हुए और उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा। 2006 के बाद वह भारत से बाहर रहने लगे और आगे चलकर कतर की नागरिकता भी ली। 9 जून 2011 को लंदन में 95 साल की उम्र में एम.एफ. हुसैन का निधन हो गया।
--आईएएनएस
पीके/एबीएम

