Medical Devices: देश में मेडिकल डिवाइस से मरीजों को गंभीर नुकसान के मामले 3 गुना बढ़े, 6 साल में दर्ज हुए 9,373 केस
भारत में मेडिकल डिवाइस के इस्तेमाल से मरीजों को होने वाले गंभीर नुकसान के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। पिछले छह साल में ऐसे मामलों की संख्या करीब तीन गुना हो गई है। इंडियन फार्माकोपिया कमीशन (IPC) के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 में मेडिकल डिवाइस से जुड़ी 808 गंभीर घटनाएं दर्ज की गई थीं। वहीं, 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,176 हो गई। 2020 से अब तक देश में ऐसे कुल 9,373 मामले सामने आए हैं।
'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, इन आंकड़ों का खुलासा पहली बार सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए हुआ है। केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के बाद IPC ने यह जानकारी उपलब्ध कराई। गंभीर घटनाओं में मरीज की जान को खतरा, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने और दूसरी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने जैसी स्थितियां शामिल हैं।
पहले सार्वजनिक नहीं होते थे गंभीर मामलों के अलग आंकड़े
IPC देशभर में मौजूद 775 निगरानी केंद्रों के जरिए मेडिकल डिवाइस के इस्तेमाल के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की जानकारी जुटाता है। हालांकि, आयोग अपनी सालाना रिपोर्ट में कुल घटनाओं की संख्या तो बताता था, लेकिन गंभीर मामलों का अलग विवरण सार्वजनिक नहीं करता था।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस जानकारी के लिए कई बार RTI आवेदन किए गए। हालांकि, IPC ने मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों के नाम और संबंधित डिवाइस की श्रेणी बताने से इनकार कर दिया। आयोग का तर्क था कि इससे कंपनियों की व्यावसायिक गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, हर मामले में यह तय करना भी आसान नहीं होता कि मरीज को हुआ नुकसान सीधे मेडिकल डिवाइस की वजह से हुआ या किसी मेडिकल प्रक्रिया में हुई चूक के कारण।
हजारों शिकायतें दर्ज, CDSCO तक पहुंचे गिने-चुने मामले
IPC की सालाना रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की संख्या काफी अधिक है, लेकिन इनमें से बहुत कम मामलों को आगे की जांच के लिए भेजा गया।
| वित्त वर्ष |
दर्ज प्रतिकूल घटनाएं |
CDSCO को भेजे गए मामले |
| 2024-25 |
14,584 |
22 |
| 2023-24 |
10,269 |
16 |
| 2022-23 |
3,868 |
12 |
आगे की कार्रवाई के लिए भेजे गए संदिग्ध मेडिकल डिवाइसों में सर्जिकल दस्ताने, सिरिंज, यूरिन बैग, प्रेग्नेंसी टेस्ट किट, कैथेटर और ब्लड प्रेशर मॉनिटर शामिल थे। इसके अलावा कुछ मामलों में वेंटिलेटर, ब्लड ट्रांसफ्यूजन सेट और हार्ट स्टेंट भी संदिग्ध डिवाइसों की सूची में आए।
गंभीर घटना की रिपोर्ट 15 दिन में देना जरूरी
भारत में मेडिकल डिवाइस से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं पर नजर रखने के लिए वर्ष 2015 में मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI) शुरू किया गया था। इसके तहत IPC ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से देशभर से ऐसी घटनाओं की जानकारी एकत्र करता है।
नियमों के अनुसार, मेडिकल डिवाइस से जुड़ी गंभीर प्रतिकूल घटना की जानकारी 15 दिनों के भीतर IPC को देना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक, किसी घटना को गंभीर तब माना जाता है, जब उससे मरीज की मौत हो जाए, उसकी जान को खतरा पैदा हो, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़े या स्थायी विकलांगता जैसी स्थिति उत्पन्न हो।
अमेरिका में मेडिकल डिवाइस की शिकायतों का सार्वजनिक डेटाबेस
मेडिकल डिवाइस से जुड़ी शिकायतों और प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए अमेरिका में MAUDE नाम का सार्वजनिक डेटाबेस उपलब्ध है। इसमें संबंधित डिवाइस के ब्रांड, निर्माता, मॉडल और उससे जुड़ी घटना का विवरण देखा जा सकता है।
भारत में सामने आए आंकड़े मेडिकल डिवाइस की सुरक्षा और उनकी निगरानी व्यवस्था को लेकर अहम सवाल खड़े करते हैं। खासकर तब, जब हजारों प्रतिकूल घटनाएं दर्ज होने के बावजूद बहुत कम मामलों को आगे की कार्रवाई के लिए भेजा गया।

