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माता के शक्तिपीठों में शामिल प्राचीन विमलकोट मंदिर भव्य मेले और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध

उत्तराखंड, 21 फरवरी (आईएएनएस)। भारत, जो अपनी प्राचीन और विविध संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, को मंदिरों और ऋषियों की पवित्र भूमि माना जाता है। यहां अनेकों मंदिर और तीर्थ स्थल हैं, जो अपनी अनूठी विशेषता और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। उन्हीं में से एक है विमलकोट देवी मंदिर।
माता के शक्तिपीठों में शामिल प्राचीन विमलकोट मंदिर भव्य मेले और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध

उत्तराखंड, 21 फरवरी (आईएएनएस)। भारत, जो अपनी प्राचीन और विविध संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, को मंदिरों और ऋषियों की पवित्र भूमि माना जाता है। यहां अनेकों मंदिर और तीर्थ स्थल हैं, जो अपनी अनूठी विशेषता और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। उन्हीं में से एक है विमलकोट देवी मंदिर।

यह मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोरा जिले के धौलछीना क्षेत्र में आठ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जो माता के शक्तिपीठों में शामिल एक प्राचीन मंदिर है। विमलकोट देवी मंदिर मां दुर्गा को समर्पित है।

माता विमलकोट शक्तिपीठ मंदिर लगभग 1515 ई.पू. से जुड़ा बताया जाता है, जो अपनी प्राचीनता, धार्मिक महत्वता, सांस्कृतिक परंपराओं और भव्य मेलों के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर स्थानीय लोगों के लिए एक अटूट आस्था का केंद्र है। माना जाता है कि यहां चंद वंशी राजाओं द्वारा अदालत लगाकर फैसले किए जाते थे।

माता विमलकोट मंदिर में प्रत्येक नववर्ष पर मंदिर समिति द्वारा भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें कुमाऊंनी लोक नृत्य, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम मुख्य आकर्षण के केंद्र होते हैं। मेले में देश-दुनिया से आए हजारों भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। विमलकोट देवी मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए काफी प्रसिद्ध है।

मंदिर को लेकर मान्यता है कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से यहां देवी की उपासना करते हैं, माता उनके सभी दुखों को हरके उनकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करती हैं, इसलिए यहां दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर आते हैं।

माता विमलकोट शक्तिपीठ मंदिर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जहां से हिमालय की लंबी श्रृंखला दिखाई देती है। मंदिर की खासियत है कि ये चारों ओर सुंदर पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से घिरा है, जो मंदिर के दृश्य को अलौकिक और अद्भुत बनाता है। मंदिर में भंडारे का भी आयोजन किया जाता है, जिसे श्रद्धालु प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

--आईएएनएस

दीपा/डीकेपी

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