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महोबा के इस शिवालय का कर्मपुराण में मिलता है उल्लेख, महादेव की 'दसभुजी' प्रतिमा के दर्शन मात्र से कटते हैं पाप

नई दिल्ली, 18 फरवरी (आईएएनएस)। देश-दुनिया में देवाधिदेव महादेव के कई मंदिर हैं, जो अपनी भव्यता के साथ ही चमत्कार और हैरत में डालने वाली कथा से ओतप्रोत हैं। उत्तर प्रदेश के महोबा में विश्व के नाथ का एक ऐसा ही मंदिर है, जो शिव तांडव मंदिर के नाम से विख्यात है। यह न केवल अपनी प्राचीनता और अनोखी प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि कर्मपुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है।
महोबा के इस शिवालय का कर्मपुराण में मिलता है उल्लेख, महादेव की 'दसभुजी' प्रतिमा के दर्शन मात्र से कटते हैं पाप

नई दिल्ली, 18 फरवरी (आईएएनएस)। देश-दुनिया में देवाधिदेव महादेव के कई मंदिर हैं, जो अपनी भव्यता के साथ ही चमत्कार और हैरत में डालने वाली कथा से ओतप्रोत हैं। उत्तर प्रदेश के महोबा में विश्व के नाथ का एक ऐसा ही मंदिर है, जो शिव तांडव मंदिर के नाम से विख्यात है। यह न केवल अपनी प्राचीनता और अनोखी प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि कर्मपुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है।

उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग शिव तांडव मंदिर के बारे में विस्तार से जानकारी देता है। यह मंदिर गोरखगिरि (गोखार) पर्वत की तलहटी में स्थित है, जहां भगवान शिव की दस भुजाओं वाली तांडव नृत्य करती मुद्रा में विशाल काले ग्रेनाइट पत्थर पर उत्कीर्ण प्रतिमा स्थापित है। इस दुर्लभ स्वरूप के दर्शन मात्र से पाप कटने और मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है।

मंदिर का मुख्य आकर्षण भगवान शिव की यह दस भुजाओं वाली महाकाल तांडव प्रतिमा है, जो एक ही शिला को तराशकर बनाई गई है। प्रतिमा में शिव गजासुर वध के बाद किए गए तांडव नृत्य की मुद्रा में दिखाए गए हैं। उनके समीप मां पार्वती की सौम्य प्रतिमा भी विराजमान है, जो करुणा और शक्ति का संतुलन दर्शाती है।

चंदेलकालीन कला की यह उत्कृष्ट कृति 11वीं शताब्दी में चंदेल शासक नान्नुक द्वारा बनवाई गई थी। उत्तर भारत में ऐसी दस भुजी तांडव प्रतिमा कहीं और नहीं मिलती, जो इसे अनोखा बनाती है। कर्मपुराण में इस तांडव स्वरूप का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि गजासुर के वध के बाद भगवान शिव ने जो नृत्य किया, वही शिव तांडव कहलाया। इसी प्रकार की प्रतिमाएं दक्षिण भारत में एलोरा, हलेबिड और दारापुरम में भी पाई जाती हैं।

महोबा की यह प्रतिमा गोरखगिरि पर्वत पर गुरु गोरखनाथ और उनके शिष्य दीपकनाथ के तप से जुड़ी मानी जाती है। पर्वत को इनके तप से तेज प्राप्त हुआ और नीचे शिव की सिद्ध तांडव प्रतिमा स्थापित हुई। महोबा ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह आल्हा-ऊदल की वीरभूमि है और त्रेता युग में भगवान राम, माता सीता व लक्ष्मण ने वनवास के दौरान यहां कुछ समय बिताया था।

गोखार पर्वत धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से महत्व रखता है। मंदिर में महाशिवरात्रि, मकर संक्रांति और सावन के सभी सोमवार के साथ ही आम दिनों में भी भक्तों की भीड़ उमड़ती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से महादेव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मान्यता है कि इस शिव तांडव मंदिर में माथा टेकने और भगवान के दर्शन मात्र से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां भक्तों को शिव तत्व की ऊर्जा महसूस होती है, जो मन को शांत और आत्मा को स्थिर करती है।

मंदिर तक पहुंच आसान है। निकटतम हवाई अड्डा खजुराहो (मध्य प्रदेश) है, जो महोबा से लगभग 56 किलोमीटर दूर है। महोबा रेल और सड़क मार्ग से झांसी, बांदा, खजुराहो और अन्य प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। कलेक्टरेट महोबा के पास स्थित यह मंदिर शहर के केंद्र से भी ज्यादा दूर नहीं है।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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