महाराष्ट्र : सुलेमान खान मॉब लिंचिंग मामले में अब तक 5 आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज
जलगांव, 15 मई (आईएएनएस)। महाराष्ट्र में सुलेमान खान मॉब लिंचिंग हत्या मामले में जलगांव सत्र न्यायालय ने अब तक पांच आरोपियों की नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी है। इससे यह साफ हो गया है कि इस मामले में आरोपियों के खिलाफ सबूत मजबूत हैं और प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।
14 मई को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी. बैंकर ने आरोपी सूरज गुरुदास भोगे और कृष्ण राजू तेली की नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी। इससे पहले आदित्य देवरे, सज्वल तेली और ऋषिकेश प्रभाकर की जमानत अर्जियां भी सत्र न्यायाधीश राजवरकर ने 21 फरवरी को खारिज कर दी थीं। इस प्रकार अब तक कुल पांच आरोपियों की नियमित जमानत अर्जियां खारिज हो चुकी हैं।
सत्र न्यायालय ने 14 मई को जारी अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपियों के खिलाफ सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), चश्मदीदों के बयान और अन्य महत्वपूर्ण सबूत उपलब्ध हैं। अदालत ने आगे यह भी माना कि यह अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। यदि आरोपियों को जमानत दी जाती है तो गवाहों को डराने-धमकाने, सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने और कानून-व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
एकता संगठन के सदस्य फारूक शेख ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर यह सवाल उठाया है कि जब अदालत आरोपों की गंभीरता और पर्याप्त सबूतों की मौजूदगी का हवाला देते हुए पांच आरोपियों की नियमित जमानत अर्जियां लगातार खारिज कर रही है, तो फिर 4 आरोपियों की डिफॉल्ट जमानत अब तक रद्द क्यों नहीं की गई है? आखिर प्रशासन "तारीख पर तारीख" देकर किसे बचाने की कोशिश कर रहा है?
जामनेर न्यायालय ने आरोपियों को इस आधार पर डिफॉल्ट जमानत दे दी थी कि निर्धारित 90 दिनों की अवधि के भीतर आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल नहीं किया गया था।
एकता संगठन के संयोजक शेख ने कहा कि सेशंस कोर्ट में डिफॉल्ट बेल रद्द करने के लिए एक अर्जी दायर की गई थी। हालांकि दो अलग-अलग जजों के सामने सुनवाई होने के बावजूद, आज तक कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। जब 12 मई को यह मामला तीसरे जज के सामने आया, तो अगली सुनवाई की तारीख सीधे 10 जून तय कर दी गई।
शेख ने कहा, "इस देरी से पीड़ित परिवार और मुस्लिम समुदाय में भारी नाराजगी पैदा हो रही है। अगर कोर्ट खुद यह मानता है कि आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत मौजूद हैं, तो उन लोगों की बेल तुरंत रद्द कर दी जानी चाहिए जो अभी डिफॉल्ट बेल पर आजाद घूम रहे हैं। वरना, इससे समाज में यह संदेश जाएगा कि आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों को, गंभीर अपराधों के मामलों में भी संरक्षण दिया जा रहा है।"
--आईएएनएस
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