हाई कोर्ट के फैसले के बाद मध्य प्रदेश में सियासत तेज, ओबीसी आरक्षण पर कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने
जबलपुर, 9 अक्टूबर (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के जबलपुर हाईकोर्ट का अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को लेकर फैसला आ गया है। राज्य में ओबीसी को दिया गया आरक्षण 14 फीसदी ही रहेगा। जबलपुर उच्च न्यायालय की न्यायाधीश आनंद पाठक और न्यायाधीश विनय सराफ की बेंच ने तय कर दिया है कि राज्य में मिलने वाला आरक्षण 14 प्रतिशत रहेगा।
न्यायालय की ओर से कहा गया है कि आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत करने के लिए ठोस कारण नहीं मिले जिससे 50 प्रतिशत की सीमा पार करना जरूरी साबित हो। बताया गया है कि न्यायालय के फैसले में यह भी कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय का 1992 में इंदिरा साहनी फैसला भी आया था, जिसमें कहा गया था कि आरक्षण सामान्यतः 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए राज्य में अगर 27 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी को कर दिया जाए तो कुल आरक्षण 63 प्रतिशत हो जाता है। इससे 50 प्रतिशत की सीमा से 13 प्रतिशत बढ़ जाएगा, इसे सही ठहरने वाली कोई असाधारण परिस्थिति साबित नहीं हुई।
जबलपुर उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद कांग्रेस और भाजपा में सियासी तकरार बढ़ गई है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि यह प्रदेश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। भाजपा सरकार की कमजोर पैरवी और ओबीसी वर्ग के सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन से जुड़े पर्याप्त तथ्य न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण आरक्षण की लड़ाई को बड़ा झटका लगा है।
पटवारी ने कहा कि वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ओबीसी वर्ग को सामाजिक न्याय दिलाने के उद्देश्य से आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का कानून बनाया था। कांग्रेस सरकार की मंशा पिछड़े वर्ग को उसका संवैधानिक अधिकार दिलाने की थी, लेकिन भाजपा सरकार ने बीते वर्षों में इस महत्वपूर्ण मुद्दे को कानूनी उलझनों में फंसा रहने दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि ओबीसी आरक्षण को लेकर सरकार ने न्यायालय में कौन-से ठोस सामाजिक और शैक्षणिक आंकड़े प्रस्तुत किए, 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के तहत अपना पक्ष कितनी मजबूती से रखा और आरक्षण की रक्षा के लिए क्या प्रभावी प्रयास किए—इन सभी सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए।
पटवारी ने आरोप लगाया कि ओबीसी आरक्षण को रोकने के लिए वकीलों पर करोड़ों खर्च किए जाने का दावा सामने आया है। उन्होंने कहा कि ओबीसी वर्ग की दुहाई देने वाले भाजपा नेताओं, विशेषकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव को प्रदेश की जनता के सामने अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए। यह आरोप है कि आरक्षण की रक्षा के लिए प्रभावी पैरवी करने के बजाय सरकार की कार्रवाई ने ओबीसी वर्ग के अधिकारों को नुकसान पहुंचाया।
उच्च न्यायालय के फैसले पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने कहा है कि कांग्रेस के कमजोर कानून के कारण पिछड़े वर्ग का नुकसान हुआ भाजपा सरकार पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिलाने के लिए संकल्पित है। वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा ओ बी सी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 करने के लिए जो कानून लाया गया, उसमें आरक्षण बढ़ाने के लिए आवश्यक विशेष परिस्थितियों का पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। इसी वजह से कानून को न्यायालय में चुनौती मिली और इस पर स्थगन की स्थिति बनी।
यादव ने आगे कहा कि भाजपा सरकार ने इस कानून को बचाने के लिए हर जरूरी प्रयास किया। बड़े-बड़े विधि विशेषज्ञों और वरिष्ठ वकीलों से सलाह ली गई तथा न्यायालय में सरकार की ओर से मजबूती से पक्ष रखा गया। इसके बावजूद उच्च न्यायालय का जो निर्णय आया है, सरकार उसका सम्मान करती है। साथ ही, फैसले की विधिक समीक्षा कर आगे की आवश्यक कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा। यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार के प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 2019 से 2022 के बीच की नियुक्तियों को संरक्षण मिला है, जिससे संबंधित अभ्यर्थियों के हित सुरक्षित रखने की व्यवस्था बनी है।
उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के अपने संकल्प पर कायम है। इसके लिए सभी आवश्यक कानूनी और संवैधानिक विकल्पों पर विचार करते हुए सरकार पिछड़े वर्ग को उसका हक और अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।
--आईएएनएस
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