लीलावती अस्पताल काला जादू मामले में निकेत मेहता को राहत, सेशन कोर्ट ने समन आदेश किया रद्द
मुंबई, 31 अक्टूबर (आईएएनएस)। मुंबई के लीलावती अस्पताल से जुड़े कथित काला जादू मामले में ग्रेटर मुंबई सेशन कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी निकेत विजय मेहता के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल फर्श के नीचे कलश मिलना अपने आप में अपराध नहीं है। किसी आपराधिक कृत्य को साबित करने के लिए उसके पीछे की मंशा और अन्य आवश्यक तथ्यों का सामने आना जरूरी है।
मझगांव स्थित ग्रेटर मुंबई सेशन कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कुणाल धनाजी जाधव ने 29 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए फैसले में क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 01/2026 को मंजूर कर लिया। इसके साथ ही बांद्रा की 12वीं अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) द्वारा 8 दिसंबर 2025 को निकेत मेहता के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया गया। फैसले पर 30 अक्टूबर को हस्ताक्षर किए गए और इसे अपलोड किया गया।
शिकायतकर्ता प्रशांत मेहता ने दावा किया था कि वह लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट के स्थायी ट्रस्टी हैं। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 18 सितंबर 2023 के आदेश के बाद करीब 20 साल की कानूनी लड़ाई के पश्चात उन्हें ट्रस्ट का प्रशासन मिला था। शिकायत के मुताबिक, प्रशासन संभालने के बाद 21 सितंबर 2024 को उनके केबिन के फर्श के नीचे से आठ तांबे के कलश बरामद हुए थे। आरोप लगाया गया था कि इन कलशों में मानव अवशेष, चावल, बाल और अन्य कथित तांत्रिक सामग्री मौजूद थीं।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि ट्रस्ट के पूर्व प्रबंधन से जुड़े निकेत मेहता और छह अन्य लोगों ने अलौकिक शक्तियों का आशीर्वाद प्राप्त करने तथा ट्रस्टियों को नुकसान पहुंचाने के इरादे से कथित तौर पर काला जादू किया था। इस मामले में चेतन मेहता, रश्मि मेहता, भाविन मेहता, सुशील मेहता, निमेश शेठ और आयुष्मान मेहता को भी आरोपी बनाया गया था।
इस संबंध में 27 सितंबर 2024 को बांद्रा पुलिस और विजिलेंस अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई गई थी। पुलिस की ओर से जांच नहीं किए जाने पर शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया था।
मजिस्ट्रेट ने 7 फरवरी 2025 को पुलिस जांच का आदेश देने से इनकार करते हुए शिकायतकर्ता का सत्यापन बयान दर्ज किया। इसके बाद 6 और 13 मार्च 2025 को दो गवाहों, सिविल कॉन्ट्रैक्टर कलूराम चित्रामल सैनी और विपुल दिलीप चावड़ा के बयान दर्ज किए गए। इसके आधार पर महाराष्ट्र नरबलि और अन्य अमानवीय, अनिष्ट एवं अघोरी प्रथा तथा जादूटोना प्रतिबंधक अधिनियम, 2013 की धारा 3(1), 3(2) और 3(3) के तहत आरोपियों को समन जारी किया गया था।
समन आदेश को चुनौती देते हुए निकेत मेहता की ओर से अधिवक्ता आलौकिक आर. पई ने सेशन कोर्ट में दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धारा 223 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना तथ्यों पर उचित विचार किए और न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए समन जारी कर दिया गया।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि शिकायत में किसी भी आरोपी की विशिष्ट भूमिका स्पष्ट नहीं की गई है। यह ट्रस्ट से जुड़े पुराने सिविल विवाद को आपराधिक मामले का रूप देने की कोशिश है। इसके अलावा, दलील दी गई कि काला जादू विरोधी कानून के तहत विजिलेंस अधिकारी की ओर से जांच और धारा 6(3) के तहत संबंधित सामग्री की जब्ती की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
--आईएएनएस
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