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क्यों ईस्टर संडे पर चली आ रही अंडों को रंगने की परंपरा? जानें ईस्टर एग्स की पीछे की रोचक कहानी

नई दिल्ली, 3 अप्रैल (आईएएनएस)। ईसाई धर्म की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा ईस्टर संडे 5 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह दिन सिर्फ खुशी का नहीं, बल्कि ईसाइयों के उस विश्वास को भी मजबूत करता है कि यीशु मसीह ईश्वर के पुत्र हैं।
क्यों ईस्टर संडे पर चली आ रही अंडों को रंगने की परंपरा? जानें ईस्टर एग्स की पीछे की रोचक कहानी

नई दिल्ली, 3 अप्रैल (आईएएनएस)। ईसाई धर्म की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा ईस्टर संडे 5 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह दिन सिर्फ खुशी का नहीं, बल्कि ईसाइयों के उस विश्वास को भी मजबूत करता है कि यीशु मसीह ईश्वर के पुत्र हैं।

गुड फ्राइडे के दो दिन बाद ईस्टर संडे सेलिब्रेट किया जाता है, जिसे यीशु मसीह के पुनरुत्थान के रूप में मनाया जाता है।

यह महज वसंत ऋतु की परंपरा या हल्के रंगों और अंडों से भरा दिन नहीं है। ईस्टर ईश्वर के वादे की पूर्ति और मृत्यु पर जीवन की विजय का उत्सव है। यह फेस्टिवल ईसाई धर्म के विश्वास का केंद्र है, जहां दुःख आनंद में बदल जाता है और मृत्यु जीवन को रास्ता देती है। यही कारण है कि दुनिया भर में ईस्टर संडे लोगों को ईश्वर से और अधिक जोड़ने में मदद करता है। यीशु मसीह का पुनरुत्थान न केवल भविष्य के लिए, बल्कि आज के लिए भी सच्ची आशा प्रदान करता है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि गुड फ्राइडे से ज्यादा ईसाई धर्म से जुड़े लोगों में ईस्टर संडे का महत्व ज्यादा है। ईस्टर संडे यीशु के पुनर्जीवित होने का दिन है। क्रूस पर चढ़ाए जाने और दफनाए जाने के बाद, यीशु तीसरे दिन वापस जीवित हो जाते हैं। बाइबल में इसका जिक्र किया गया है कि क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले यीशु मसीह ने अपनी वापसी की बात कही थी। अपने किए वादे के अनुसार वो वापस आए, जिससे लोगों का विश्वास दृढ़ हो गया। बाइबल ईस्टर संडे को परमेश्वर द्वारा किए गए उद्धार की कहानी बताती है, जिसमें पाप पर विजय प्राप्त करना और टूटी हुई चीजों को पुनर्स्थापित करने जैसी बातों पर फोकस किया गया है।

ईस्टर कोई एक घटना नहीं है, बल्कि यीशु मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान के माध्यम से परमेश्वर के वादों की पूर्ति है। यह परमेश्वर के प्रेम और शक्ति का उदाहरण है। ईस्टर संडे के दिन ईस्टर एग्स का भी बहुत महत्व माना जाता है। ईस्टर वीक में मांस और मदीरा पर प्रतिबंध है, लेकिन अंडों को रंगने की परंपरा 13वीं शताब्दी से चली आ रही है। 13वीं शताब्दी में ईस्टर वीक में मुर्गियों के अंडे को पवित्र मानकर उन्हें नई किरण के रूप में रंगा गया। अंडे में से भी नया जीवन निकलता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे यीशु मसीह दोबारा जीवित हो गए थे।

यही कारण है कि ईस्टर संडे के दिन ईस्टर एग्स को सजाने की परंपरा को आज भी निभाया जाता है। ऑर्थोडॉक्स (ईसाई धर्म की एक प्राचीन, रूढ़िवादी शाखा) परंपरा में अंडों को लाल रंग से रंगा जाता है, जो क्रूस पर यीशु द्वारा बहाए गए रक्त का प्रतीक है।

--आईएएनएस

पीएस/डीकेपी

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