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क्या है ओपेक, जिससे यूएई ने खुद को अलग करने का किया ऐलान?

नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। होर्मुज संकट और ईरान के साथ पश्चिम एशिया में तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) से अलग होने का ऐलान किया है। 1 मई से यूएई ओपेक से अलग हो जाएगा। ईरान के हमले के बाद से यूएई ने दो बड़े फैसले लिए, जिसने सबको हैरान कर दिया। आइए जानते हैं कि ओपेक क्या है, और यह दुनिया में तेल सप्लाई और कीमत को कैसे प्रभावित करता है।
क्या है ओपेक, जिससे यूएई ने खुद को अलग करने का किया ऐलान?

नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। होर्मुज संकट और ईरान के साथ पश्चिम एशिया में तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) से अलग होने का ऐलान किया है। 1 मई से यूएई ओपेक से अलग हो जाएगा। ईरान के हमले के बाद से यूएई ने दो बड़े फैसले लिए, जिसने सबको हैरान कर दिया। आइए जानते हैं कि ओपेक क्या है, और यह दुनिया में तेल सप्लाई और कीमत को कैसे प्रभावित करता है।

हाल ही में यूएई ने पाकिस्तान से अपना 3.45 अरब डॉलर का कर्ज वापस मांगा था। इसके बाद अब उसने ओपेक से खुद को बाहर करने का ऐलान किया है। ऐसा माना जा रहा है कि ईरान की तरफ से खाड़ी देशों पर किए गए हमले का मिलकर जवाब ना देने की वजह से यूएई में नाराजगी है। इसके साथ ही पाकिस्तान की तरफ से ईरान के खिलाफ स्पष्ट रुख ना अपनाना भी एक वजह है।

ओपेक की स्थापना 14 सितंबर 1960 को इराक के बगदाद में हुई थी। यह तेल उत्पादक देशों का एक स्थायी और अंतर सरकारी संगठन है, जो वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए उत्पादन और कीमतों में समन्वय रखता है। इसकी स्थापना पेट्रोलियम की अच्छी, किफायती और रेगुलर सप्लाई सुनिश्चित करने के साथ तेल बाजार को स्थिर करने के लिए की गई थी।

शुरुआत में, इसके सिर्फ पांच सदस्य थे: ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला। हालांकि, बाद में यह बढ़कर 12 हो गया है, जो मिलकर दुनिया के कच्चे तेल के प्रोडक्शन का लगभग 36.17 फीसदी सप्लाई करते हैं। ओपेक के सदस्य दुनिया के कुल सिद्ध कच्चे तेल के भंडार का लगभग 79.22 फीसदी कंट्रोल करते हैं। 1960 में इसकी स्थापना के बाद संयुक्त अरब अमीरात 1967 में इसमें शामिल हुआ।

ओपेक सदस्य मार्केट पर नजर रखते हैं और कीमतें और सप्लाई स्थिर रखने के लिए तेल का प्रोडक्शन बढ़ाने या घटाने का मिलकर फैसला करते हैं। हालांकि, तेल का प्रोडक्शन बढ़ाने या घटाने के लिए संगठन के सदस्यों का एकमत से वोटिंग जरूरी है।

संयुक्त अरब अमीरात अमीरात तेल का प्रोडक्शन बढ़ाना चाहता है, जबकि सऊदी अरब कम उत्पादन चाहता है। यूएई ओपेक में तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। हालांकि, सऊदी अरब के पास तेल उत्पादन कोटा का नियंत्रण है, जिसकी वजह से यूएई अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से तेल निर्यात नहीं कर पा रहा है।

ऐसे में यूएई ओपेक से निकलता है, तो उसके पास अपने हिसाब से तेल निर्यात करने के लिए फैसले लेने का हक होगा। अपनी जरूरतों के हिसाब से वह प्रोडक्शन और निर्यात बढ़ाकर लाभ ले सकता है। हालांकि, इसका नुकसान ये होगा कि सऊदी अरब का तेल बाजार पर पकड़ कम हो सकता है।

यूएई के ओपेक से निकलने के बाद तेल की कीमतों पर भी असर पड़ेगा। मीडिया रिपोर्ट्स का अनुमान है कि वैश्विक बाजार में तेल की कीमत में गिरावट देखने को मिलेगी और सप्लाई बढ़ेगा। इससे भारत को सीधा फायदा मिल सकता है। भारत भारी मात्रा में तेल आयात करता है। ऐसे में तेल सप्लाई बढ़ने की वजह से उसे कम कीमत में तेल आयात हो सकता है, जिसकी वजह से महंगाई पर भी असर पड़ने की उम्मीद है।

हालांकि, इससे ना केवल सऊदी अरब की नेतृत्व वाली भूमिका कमजोर होगी और फैसले लेने में मतभेद का सामना करना पड़ेगा, बल्कि तेल बाजार में कीमतों में अस्थिरता भी देखने को मिल सकता है।

वहीं ओपेक के सदस्य देशों और 10 गैर-ओपेक देशों को मिलाकर 'ओपेक प्लस' समूह का गठन किया गया है। इस संगठन में रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, दक्षिण सूडान और सूडान जैसे देश शामिल हैं।

--आईएएनएस

केके/एएस

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