कुल्लू में शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव, 347 देवी-देवताओं को दिया गया निमंत्रण
कुल्लू, 21 अक्तूबर (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा बुधवार से शुरू हो गया है। इस साल यह भव्य उत्सव 21 अक्टूबर से 27 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। यह उत्सव विजयादशमी के दिन से शुरू होकर पूरे 7 दिनों तक चलता है।
इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत इसकी शुरुआत है। इसकी शुरुआत भगवान श्री रघुनाथ जी की भव्य रथयात्रा और सैकड़ों देवी-देवताओं के मिलन से होती है। यह देश के अन्य दशहरा उत्सवों से बिल्कुल अलग है क्योंकि यहां रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते।
कुल्लू दशहरा उत्सव के लिए भगवान रघुनाथ के मंदिर में शीश नवाने के लिए बुधवार सुबह से ही देवी-देवताओं के पहुंचने का सिलसिला जारी है। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि इस बार कुल 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया है। इसे देवताओं का महाकुंभ भी कहा जाता है। बुधवार सुबह से ही देवी-देवता भगवान रघुनाथ के मंदिर में आ रहे हैं। माता हडिंबा के आने के बाद दोपहर में रथ यात्रा का शुभारंभ होगा।
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने आईएएनएस से कहा, "सभी को कुल्लू अंतरराष्ट्रीय विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। रघुनाथ जी कुल्लू के आराध्य देव हैं। लोग दूर-दूर से पैदल चलकर रघुनाथ जी से मिलने और अपनी बात रखने आ रहे हैं। हम इसे अपनी भाषा में 'चक्री' बोलते हैं। गांव में रघुनाथ जी को ठाकुर जी बोलते हैं क्योंकि विष्णु भगवान भी ठाकुर के रूप में माने जाते हैं।"
बता दें कि कुल्लू दशहरा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के समय हुई थी, जब उन्होंने भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को अपनी गद्दी पर स्थापित किया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। यहां विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में नहीं बल्कि देवी-देवताओं के मिलन उत्सव के रूप में मनाई जाती है।
ढालपुर के कला केंद्र में प्रतिदिन सांस्कृतिक संध्याएं आयोजित होती हैं, जिनमें पारंपरिक कुल्लवी नाटी, लोक नृत्य तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र होती हैं। भव्य हिमालय की गोद में बसा कुल्लू वास्तव में हिमाचल प्रदेश के मुकुट का एक अनमोल रत्न है। यहां के अद्भुत प्राकृतिक परिदृश्यों की सुंदरता, लोगों का आतिथ्य सत्कार, विशिष्ट जीवनशैली और समृद्ध संस्कृति युगों-युगों से यात्रियों को मंत्रमुग्ध करती आ रही है।
इस घाटी की 'देव संस्कृति' आस्था, पौराणिक कथाओं और इतिहास का सुंदर संगम है, जो लौकिक और दैवीय शक्तियों के बीच एक अनूठा संबंध स्थापित करती है। वर्ष भर स्वास्थ्यवर्धक एवं सुखद मौसम वाला यह जिला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कुल्लू और मनाली, पार्वती घाटी के नैसर्गिक सौंदर्य, 'ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क' की प्रचुर जैव विविधता, पहाड़ी शैली की प्राचीन मंदिर वास्तुकला और पूरे क्षेत्र में फैले ट्रैकिंग मार्गों के लिए जाना जाता है।
--आईएएनएस
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