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ख्वाजा अहमद अब्बास को पहली ही नजर में भा गए थे अमिताभ बच्चन, ऐसे दिया था इंडस्ट्री में ब्रेक

मुंबई, 31 मई (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में सामाजिक-यथार्थवादी फिल्म निर्माता-निर्देशक, लेखक और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता है। अपनी अलग पहचान बनाने वाले अब्बास को भारतीय समानांतर सिनेमा के अग्रदूतों में से एक माना जाता है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह भी रही कि उन्होंने फिल्म जगत को अमिताभ बच्चन जैसा नायक दिया।
ख्वाजा अहमद अब्बास को पहली ही नजर में भा गए थे अमिताभ बच्चन, ऐसे दिया था इंडस्ट्री में ब्रेक

मुंबई, 31 मई (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में सामाजिक-यथार्थवादी फिल्म निर्माता-निर्देशक, लेखक और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता है। अपनी अलग पहचान बनाने वाले अब्बास को भारतीय समानांतर सिनेमा के अग्रदूतों में से एक माना जाता है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह भी रही कि उन्होंने फिल्म जगत को अमिताभ बच्चन जैसा नायक दिया।

ख्वाजा अहमद अब्बास ने न सिर्फ समानांतर सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान दिया बल्कि अपनी फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ के जरिए अमिताभ बच्चन जैसे महानायक को फिल्म इंडस्ट्री में पहला ब्रेक भी दिया। पहली मुलाकात में ही अब्बास साहब अमिताभ की प्रतिभा पर मुग्ध हो गए थे।

ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था। वह पटकथा लेखक, निर्देशक, उपन्यासकार और पत्रकार के रूप में भी मशहूर रहे। अंग्रेजी शासन के दौरान जन्म लेने वाले अब्बास साहब की शुरुआती शिक्षा पानीपत के हाली मुस्लिम हाई स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बी.ए. और एलएलबी की डिग्री हासिल की।

अब्बास साहब ने करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की। 1936 में वे बॉम्बे टॉकीज से जुड़े और 1941 में फिल्म ‘नया संसार’ के लिए पटकथा लिखी। 1945 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ का निर्देशन किया। 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ बैनर के तहत फिल्म निर्माण शुरू किया। उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था। साल 1969 में आई फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ ख्वाजा अहमद अब्बास के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई। इस फिल्म ने न सिर्फ एकता पर गहरा संदेश दिया, बल्कि अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा में एंट्री भी दिलाई।

अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में याद करते हुए बताया था, जब ख्वाजा अहमद अब्बास नए चेहरों की तलाश में थे, तब मैं कलकत्ता की नौकरी छोड़कर दिल्ली आया था। मुंबई में जुहू के तारा रोड पर अब्बास के अपार्टमेंट में मुलाकात हुई। आधे घंटे की बातचीत के बाद अब्बास साहब को मैं पसंद आ गया। उनके असिस्टेंट ने बाहर आकर बताया कि मेरी तस्वीर के साथ ही मेरी शैली भी उन्हें पसंद आई और मुझे फिल्म में ले लिया गया है।

अमिताभ ने यह भी बताया कि ‘सात हिंदुस्तानी’ की शूटिंग के दौरान अब्बास साहब का पूरा कास्ट और क्रू एक परिवार की तरह रहा। अमिताभ ने बताया कि वे थर्ड क्लास डिब्बे में यात्रा करते थे, जंगलों में सर्किट हाउस में रहते थे और सब एक साथ फर्श पर सोते थे। अब्बास साहब का मानना था कि कलाकारों को किरदार के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए। उन्होंने किसी तरह का भेदभाव नहीं रखा।

ख्वाजा अहमद अब्बास राज कपूर के भी प्रिय पटकथा लेखक थे। उन्होंने ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘बॉबी’ जैसी फिल्मों की पटकथा लिखी। वे भारतीय समानांतर सिनेमा के अग्रणी माने जाते हैं। 1969 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अपने पूरे जीवन में अब्बास साहब ने सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाईं। उनकी कलम हमेशा आम आदमी की आवाज बनी रही।

1 जून 1987 को 72 वर्ष की आयु में पटकथा लेखक का निधन हो गया, लेकिन उनकी फिल्में और लेखन आज भी प्रासंगिक हैं।

--आईएएनएस

एमटी/वीसी

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