केरल हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: जजों में मतभेद हो सकते हैं, वीडियो में जाने लेकिन आपसी सम्मान जरूरी
केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि न्यायाधीश कानून के सवालों पर अलग-अलग राय रख सकते हैं, लेकिन उनके बीच आपसी सम्मान, संयम और न्यायिक शिष्टाचार बनाए रखना जरूरी है। किसी भी बेंच को दूसरी बेंच से संस्थागत रूप से श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने क्या कहा?
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सभी जज समान दर्जे के हैं: हाईकोर्ट की किसी भी बेंच को दूसरी बेंच पर श्रेष्ठता का दावा नहीं करना चाहिए।
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पीयर रेस्ट्रेंट जरूरी: बराबरी के न्यायाधीशों के बीच संयम न्यायिक अनुशासन का बुनियादी हिस्सा है।
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सिर्फ नजीरों का पालन ही पर्याप्त नहीं: पीयर रेस्ट्रेंट में बाध्यकारी कानूनी नजीरों का सम्मान करने के साथ-साथ बेंचों के बीच शिष्टाचार, सामंजस्य और आपसी सम्मान भी शामिल हैं।
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न्यायपालिका पर भरोसा बनाए रखना: इन सिद्धांतों से न्यायिक फैसलों में एकरूपता और संस्थागत विश्वसनीयता बनी रहती है।
मामला क्या था?
जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की डिवीजन बेंच ने तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी की अपील पर 15 अक्टूबर को दिए गए फैसले में ये टिप्पणियां कीं। कोच्चि में 26 अक्टूबर को जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, कोर्ट ने लेबर कोर्ट को अनुशासनात्मक कार्रवाई की समय-सीमा बढ़ाने के आवेदन पर दो महीने के भीतर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।
‘पीयर रेस्ट्रेंट’ का आसान मतलब
इसका अर्थ है कि समान न्यायिक दर्जा रखने वाले जज अपने कानूनी मतभेदों को व्यक्त करते समय एक-दूसरे के प्रति सम्मान और संयम बनाए रखें। किसी फैसले से असहमति होने का मतलब यह नहीं है कि एक बेंच दूसरी से ऊंची है।

