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केरल में एफसीआरए संशोधन पर बहस तेज: कांग्रेस नेता ने आलोचना की

तिरुवनंतपुरम, 31 मार्च (आईएएनएस)। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इन्हें मौलिक अधिकारों पर अतिक्रमण बताया है, जबकि केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन ने इन बदलावों का बचाव करते हुए कहा कि ये प्रगतिशील और कानूनी रूप से सही हैं।
केरल में एफसीआरए संशोधन पर बहस तेज: कांग्रेस नेता ने आलोचना की

तिरुवनंतपुरम, 31 मार्च (आईएएनएस)। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इन्हें मौलिक अधिकारों पर अतिक्रमण बताया है, जबकि केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन ने इन बदलावों का बचाव करते हुए कहा कि ये प्रगतिशील और कानूनी रूप से सही हैं।

तिरुवनंतपुरम में मीडिया से बात करते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि ये संशोधन अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के विचारों से कहीं आगे जाते हैं और भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

उन्होंने इन प्रावधानों को कठोर और तानाशाही बताया और आरोप लगाया कि ये कानून के समक्ष समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी कई संवैधानिक गारंटियों का हनन करते हैं।

मनीष तिवारी ने कहा कि यह विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में दोषपूर्ण है और इसे या तो वापस लेना चाहिए या व्यापक परामर्श और जांच के लिए किसी संयुक्त संसदीय समिति या प्रवर समिति को भेजा जाना चाहिए।

इस आलोचना के जवाब में केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन ने कहा कि ये संशोधन रचनात्मक बदलाव लाते हैं और पर्याप्त कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं। उन्होंने बताया कि अदालतों में फैसलों को चुनौती देने और अपील करने के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं, जिससे एफसीआरए ढांचे में प्रक्रियात्मक निष्पक्षता प्रभावी बनी रहती है।

कुरियन ने यह भी कहा कि संशोधन का विरोध करने वालों को यह समझना चाहिए कि ऐसा अवसर शायद दोबारा न मिले। उन्होंने उन चिंताओं को खारिज किया कि यह कानून धार्मिक संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाएगा और इसे भ्रामक बताया।

केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन मामलों में संस्थाएं ठीक से काम नहीं कर रही होती हैं, उनमें सरकारी हस्तक्षेप के प्रावधान पहले से ही मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि यह नीतिगत बदलाव सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ किया गया है।

उन्होंने आगे यह भी कहा कि जिन संस्थाओं का एफसीआरए पंजीकरण निलंबित या रद्द कर दिया गया है, वे राहत पाने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटा सकती हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एफसीआरए से जुड़ी पाबंदियां कई मामलों में लागू की गई हैं, चाहे किसी का भी इसमें जुड़ाव हो। इनमें धार्मिक नेताओं और संगठनों से जुड़े मामले भी शामिल हैं।

केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन ने आगे कहा कि केरल में उठाई गई चिंताओं से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को अवगत करा दिया गया है और इस मुद्दे पर संसद में चर्चा होने की संभावना है।

दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े होने के कारण एफसीआरए संशोधन राजनीतिक और कानूनी हलकों में विवाद का विषय बने हुए हैं। यह मुद्दा 9 अप्रैल को होने वाले केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा की उम्मीदों को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि राज्य में यह एक बड़ा राजनीतिक टकराव बन गया है। चर्च के नेता और कांग्रेस इस पर कड़ी आपत्ति जता रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

ऑर्थोडॉक्स चर्च के सर्वोच्च प्रमुख, बेसेलियोस मार्थोमा मैथ्यूज III कैथोलिकोस ने ईसाई समुदाय की ओर से आलोचना की अगुवाई की। उन्होंने चेतावनी दी कि इन संशोधनों से चर्च के कामकाज पर असर पड़ सकता है, लंबे समय से चल रही सामाजिक सेवाओं में बाधा आ सकती है और शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा तथा दान-पुण्य से जुड़े संस्थानों पर कड़ी पाबंदियां लग सकती हैं।

उन्होंने बताया कि चर्च के तीन बैंक खाते पहले ही ब्लॉक किए जा चुके हैं, जबकि इसके लिए कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने यह मामला उठाने के बावजूद, अब तक इसका कोई समाधान नहीं निकल पाया है।

इसी तरह की चिंताएं जताते हुए, सीरो-मालाबार चर्च सहित अन्य ईसाई संप्रदायों के नेताओं ने आगाह किया कि प्रस्तावित प्रावधान विशेष रूप से वे प्रावधान जो लाइसेंस के नवीनीकरण न होने पर केंद्र सरकार को संपत्ति अपने कब्जे में लेने की अनुमति देते हैं—दशकों में खड़े किए गए दान-पुण्य वाले संस्थानों को गंभीर रूप से कमजोर कर सकते हैं।

--आईएएनएस

एमएस/

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