केजरीवाल के ‘सत्याग्रह’ ऐलान पर विवाद, कानूनी विशेषज्ञों ने कहा- अनुचित कदम
नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को लिखे गए पत्र और उसके बाद ‘सत्याग्रह’ के ऐलान पर कानूनी विशेषज्ञों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इस मुद्दे पर सीनियर एडवोकेट आदिश सी. अग्रवाल ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह का कदम पूरी तरह अनुचित है।
अग्रवाल ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत के दौरान कहा कि जो व्यक्ति तीन बार दिल्ली का मुख्यमंत्री रह चुका हो, उसके पद की गरिमा और प्रोटोकॉल का ध्यान रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि किसी न्यायिक आदेश से असहमति है, तो उसके खिलाफ उच्च अदालतों, विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जा सकता है। इस तरह सार्वजनिक तौर पर सत्याग्रह का रास्ता अपनाना न्यायिक व्यवस्था के लिए गलत संदेश दे सकता है और इससे कानून-व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
वहीं दूसरी ओर, इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए वकील ऋषिकेश कुमार ने अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केजरीवाल और सिसोदिया का कदम न्यायपालिका के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह संवैधानिक अधिकारों के अंतर्गत आता है, जहां किसी वादी को यह आशंका हो सकती है कि उसे निष्पक्ष न्याय नहीं मिलेगा।
उन्होंने कहा कि संबंधित याचिका खारिज होने के बाद उनके पास दो विकल्प थे—या तो उसी अदालत में पुनः दलील रखें और निर्णय का इंतजार करें, या फिर अपनी आशंकाओं को बरकरार रखते हुए वैकल्पिक रास्ता चुनें। उनके अनुसार, सत्याग्रह का रास्ता भी एक वैधानिक और ऐतिहासिक रूप से मान्य तरीका है, जिसका उपयोग महात्मा गांधी ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष में किया था।
उन्होंने कहा कि यदि कोई वादी न्यायिक प्रक्रिया में भाग लेने से इनकार करता है या अदालत में पेश नहीं होता, तो अदालत एकतरफा सुनवाई कर उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निर्णय दे सकती है। ऐसे में सत्याग्रह का चयन एक प्रकार का वैचारिक विरोध है, न कि अदालत की अवमानना।
--आईएएनएस
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