कौन थे पंडित लच्छू महाराज, जिनकी तबले की गूंज आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में है?
नई दिल्ली, 28 जून (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित लच्छू महाराज का नाम आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। 27 जुलाई 2016 को इस महान तबला वादक का निधन हुआ था, लेकिन उनकी कला आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में अमर है।
पंडित लच्छू महाराज का जन्म 16 अक्टूबर 1944 को वाराणसी में हुआ था। उनका असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था। बनारस घराने की संगीत परंपरा में पले-बढ़े लच्छू महाराज ने बचपन से ही तबला वादन की ओर रुझान दिखाया। उनके पिता वासुदेव महाराज और चाचा पंडित बिंदादीन महाराज से उन्होंने तबला की बारीकियां सीखीं। कठोर साधना और लगन के बल पर वे बनारस घराने के प्रमुख तबला वादक बन गए।
लच्छू महाराज केवल शास्त्रीय संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने बॉलीवुड में भी अपनी अलग पहचान बनाई। 1949 में फिल्म 'महल' से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने 'मुगल-ए-आजम' (1960), 'पाकीजा' (1972), 'छोटी-छोटी बातें' (1965) जैसी क्लासिक फिल्मों में तबला वादन किया। उनकी तबला की थाप ने इन फिल्मों की धुनों को जान डाल दी।
हालांकि फिल्मी दुनिया की चकाचौंध के बावजूद लच्छू महाराज खुद को कभी 'फिल्मी कलाकार' नहीं मानते थे। वे हमेशा खुद को एक संगीत साधक ही कहते थे। उनका मानना था कि संगीत आत्मा की आवाज है, न कि सिर्फ मनोरंजन का साधन। इस सच्चाई ने उनकी कला को और भी गहराई दी।
लच्छू महाराज ने देश-विदेश के कई बड़े मंचों पर अपनी कला का लोहा मनवाया। 1972 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि श्रोताओं की तालियां और प्यार ही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।
लच्छू महाराज का परिवार भी कला से गहरा जुड़ा था। उनकी बहन निर्मला देवी अभिनेता गोविंदा की मां थीं। उन्होंने फ्रांस की महिला टीना से शादी की थी और उनकी एक बेटी नारायणी है।
पंडित लच्छू महाराज ने तबला वादन को न सिर्फ शास्त्रीय रूप में, बल्कि फिल्मी संगीत में भी नई ऊंचाई दी। उनकी थाप में बनारस घराने की परंपरा, लय की शुद्धता और भाव की गहराई झलकती थी। उन्होंने कई शिष्यों को प्रशिक्षित भी किया, जिनमें से कई आज संगीत जगत में अपनी पहचान बना चुके हैं।
27 जुलाई 2016 को हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कला आज भी जीवित है। जब भी कोई फिल्मी गाने में तबला की थाप सुनाई देती है। संगीत प्रेमी लच्छू महाराज को याद करते हैं।
पंडित लच्छू महाराज संगीत की उस परंपरा के प्रतीक थे, जो साधना, समर्पण और शुद्धता पर टिकी हुई है। फिल्मी दुनिया में चमकते हुए भी उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। आज के युवा संगीतकारों के लिए वे प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में लच्छू महाराज का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। उनकी कला न सिर्फ तबला वादकों, बल्कि पूरे संगीत जगत के लिए एक अमर विरासत है।
--आईएएनएस
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