कारगिल के दो अमर वीर : 'शेरशाह' विक्रम बत्रा और 'द्रास के शेर' अनुज नैयर की अद्भुत शौर्यगाथा
नई दिल्ली, 6 जुलाई (आईएएनएस)। देश की सरहदों की रक्षा करने वाले और अपनी जान कुर्बान करने वाले दीवाने कुछ अलग ही मिट्टी के बने होते हैं। जब तिरंगे की आन पर बन आती है तो हिंदुस्तान के वीर ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। चाहे जान की बाजी क्यों लगानी न पड़े, वतन के रखवालों के कदम पीछे नहीं हटते। ऐसे ही थे वीर योद्धा कैप्टन विक्रम बत्रा और अनुज नैयर, जिनमें से एक 'शेरशाह' कहलाया और दूसरे को दुनिया ने 'द्रास का शेर' कहा।
मई 1999 में कारगिल में घुसपैठ की घटना को एक आम बात माना जा रहा था। किसी को भी हालात की गंभीरता का अंदाजा नहीं था। हालांकि, जल्द ही यह पता चला कि घुसपैठियों ने सर्दियों के दौरान भारतीय सैनिकों की ओर से खाली की गई ऊंचाई वाली चौकियों पर कब्जा कर लिया था और इस तरह उन्हें रणनीतिक बढ़त मिल गई थी जबकि भारतीय सेना को खुफिया जानकारी जुटाने में मुश्किल हो रही थी। तब कारगिल के युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा और अनुज नैयर ने वीरता की ऐसी कहानी लिखी, जिसने पूरे देश को गौरवान्वित किया।
"मैं या तो तिरंगे को लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा, पर मैं आऊंगा जरूर", 9 सितंबर 1974 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा ने कुछ इसी तरह की शौर्यगाथा लिखी।
'शेरशाह' कहलाए कैप्टन विक्रम बत्रा और उनकी कंपनी को कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम इलाके में दुश्मन की मजबूत चौकियों को साफ कर पॉइंट 4875 तक पहुंचने का काम सौंपा गया। विक्रम बत्रा ने अद्भुत साहस, रणनीति और नेतृत्व का परिचय देते हुए जिम्मेदारी को स्वीकार किया। कैप्टन विक्रम बत्रा ने आमने-सामने की मुठभेड़ में पांच दुश्मन सैनिकों को बेहद नजदीक से मार गिराया जबकि वो खुद पहले से घायल थे। उन्होंने अगले दुश्मन ठिकाने की ओर बढ़ते हुए हैंड ग्रेनेड फेंके और वहां से भी दुश्मनों को खदेड़ दिया।
मुश्किल हालातों में भारतीय फौज ने पॉइंट 4875 पर झंडा फहरा दिया। हालांकि इस ऑपरेशन में 7 जुलाई को विक्रम बत्रा शहीद हो गए। इन सभी अभियानों में कैप्टन विक्रम बत्रा का अदम्य साहस, नेतृत्व और बलिदान अमिट छाप छोड़ गया। मरणोपरांत भारत सरकार ने कैप्टन विक्रम बत्रा को भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया। उनकी याद में पॉइंट 4875 को भी बत्रा टॉप नाम दिया गया।
28 अगस्त 1975 को दिल्ली में जन्मे कैप्टन अनुज नैयर की कहानी भी बेजोड़ बहादुरी की गाथा है। वह कारगिल की जंग में महज 23 साल की उम्र में शहीद हुए। दुनिया अनुज नय्यर को 'द्रास के शेर' के नाम से जानती है।
कैप्टन अनुज नैयर 17 जाट रेजिमेंट का हिस्सा थे। जुलाई में दो रातों तक चली भीषण लड़ाई में उन्होंने बहादुरी से मुकाबला किया और उस चोटी पर कब्जा किया जो 'ऑपरेशन विजय' और कारगिल में भारत की जीत के लिए बहुत जरूरी थी। भारी तोपखाने और मोर्टार की गोलाबारी के बीच उन्होंने दुश्मन के चार बंकर नष्ट कर दिए और आमने-सामने की लड़ाई में कई घुसपैठियों को मार गिराया। चौथे बंकर पर हमले के दौरान 23 वर्षीय कैप्टन दुश्मन के रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड की चपेट में आ गए और मौके पर ही शहीद हो गए।
शहीद अनुज की मां मीना नैयर ने एक इंटरव्यू में कहा था, "6 जुलाई 1999 को ब्रिगेडियर गिल, जो 79 ब्रिगेड को मैनेज कर रहे थे, ने मुझे फोन किया था और बताया कि अनुज एक बड़े ऑपरेशन के लिए जा रहा है। मुझे यह नहीं पता था कि वह किस बड़े ऑपरेशन के लिए जा रहा है। वह तीन बंकर ले चुका था और चौथे बंकर पर कब्जा लेना था।"
वे बताती हैं, "बंकर के अंदर बैठकर अनुज ने एक साथी जवान से पूछा था कि मुझे भूख लगी है, कुछ खाने को है। जवान ने बिस्किट दिए और अनुज ने दो-तीन बिस्किट खाए। फिर उसने सिगरेट पी। इसके बाद अनुज ने फिर से मोर्चा संभाला। तभी एक आरपीजी आकर अनुज के गर्दन पर लगी थी। हमें पौने 10 बजे फोन आया कि अनुज अब नहीं रहे।"
अपनी टीम को खुद मिसाल बनकर प्रेरित करने और अपनी ड्यूटी से आगे बढ़कर काम करने के लिए कैप्टन अनुज नय्यर को साल 2000 में भारत के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया।
--आईएएनएस
डीसीएच/पीएम

