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कभी ऊंची कुर्सी पर बैठकर बजाते थे मंडोलिन, आगे चलकर 750 फिल्मों के संगीतकार बने लक्ष्मीकांत

कभी ऊंची कुर्सी पर बैठकर बजाते थे मंडोलिन, आगे चलकर 750 फिल्मों के संगीतकार बने लक्ष्मीकांत
कभी ऊंची कुर्सी पर बैठकर बजाते थे मंडोलिन, आगे चलकर 750 फिल्मों के संगीतकार बने लक्ष्मीकांत

मुंबई, 2 नवंबर (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा में कई ऐसे संगीतकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी धुनों से फिल्मों को यादगार बना दिया। उनके गाने आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। लेकिन इन सुरीली धुनों के पीछे कई बार ऐसी मेहनत और संघर्ष की कहानियां छिपी होती हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। ऐसी ही कहानी संगीतकार लक्ष्मीकांत की है। एक समय ऐसा था, जब उन्हें फिल्मी रिकॉर्डिंग के दौरान अपनी छोटी लंबाई के कारण ऊंची कुर्सी पर बैठकर मंडोलिन बजाना पड़ता था, ताकि उनका वाद्य यंत्र ठीक से रिकॉर्ड हो सके। आगे चलकर इसी कलाकार ने प्यारेलाल के साथ मिलकर हिंदी सिनेमा को ऐसे गाने दिए, जो आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।

लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर का जन्म 3 नवंबर 1937 को मुंबई में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक तंगी में बीता। जब वह छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए वह अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए। उनके पिता के एक दोस्त संगीतकार थे। उन्होंने लक्ष्मीकांत और उनके बड़े भाई को संगीत सीखने की सलाह दी। इसके बाद लक्ष्मीकांत ने मंडोलिन सीखना शुरू किया। उन्होंने करीब दो साल तक मशहूर मंडोलिन वादक हुसैन अली से इसकी शिक्षा ली। बाद में उन्होंने बाल मुकुंद इंदोरकर से भी मंडोलिन सीखा और वायलिन की बारीकियां भी समझीं।

लक्ष्मीकांत का फिल्मों से जुड़ाव बचपन में ही शुरू हो गया था। उन्होंने बतौर बाल कलाकार फिल्म 'भक्त पुंडलिक' और 'आंखें' में काम किया। कुछ गुजराती फिल्मों में भी वह नजर आए। हालांकि, उनका असली लगाव संगीत से था। वह अलग-अलग कार्यक्रमों में मंडोलिन बजाते थे और इससे होने वाली कमाई से परिवार की मदद करते थे। धीरे-धीरे उन्हें फिल्मी ऑर्केस्ट्रा में काम मिलने लगा।

उस दौर में फिल्म के गाने रिकॉर्ड करने के लिए बड़े ऑर्केस्ट्रा का इस्तेमाल होता था। लक्ष्मीकांत अपनी छोटी उम्र और कद के बावजूद बड़े कलाकारों के बीच बैठकर मंडोलिन बजाते थे। उनकी लंबाई कम होने के कारण रिकॉर्डिंग के समय उन्हें ऊंची कुर्सी पर बैठाया जाता था, ताकि वह बाकी कलाकारों के साथ सही तरीके से अपना काम कर सकें। उनकी इसी मेहनत और संगीत की समझ ने उन्हें धीरे-धीरे पहचान दिलाई। उन्होंने सी. रामचंद्र, ओ.पी. नैयर, शंकर-जयकिशन और हेमंत कुमार जैसे संगीतकारों के साथ काम किया।

इसी दौरान उनकी मुलाकात प्यारेलाल शर्मा से हुई। प्यारेलाल भी संगीत सीख रहे थे और वायलिन बजाने में माहिर थे। दोनों की दोस्ती हुई और फिर यह दोस्ती संगीत की दुनिया में एक मजबूत जोड़ी बन गई। दोनों ने कुछ समय तक बड़े संगीतकारों के सहायक के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने गाने तैयार करने, ऑर्केस्ट्रा संभालने और रिकॉर्डिंग से जुड़ी कई बारीकियां सीखीं।

लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल ने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में 1963 में फिल्म 'पारसमणि' से शुरुआत की। फिल्म के गाने लोगों को पसंद आए और दोनों को पहली बड़ी पहचान मिली। इसके बाद 1964 में आई फिल्म 'दोस्ती' ने उनकी सफलता को और आगे बढ़ाया। इस फिल्म के संगीत के लिए दोनों को पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद दोनों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

इस जोड़ी ने 'मिलन', 'दो रास्ते', 'इंतकाम', 'बॉबी', 'अमर अकबर एंथनी', 'सरगम', 'कर्ज', 'एक दूजे के लिए', 'हीरो', 'तेजाब' और 'मिस्टर इंडिया' जैसी फिल्मों में संगीत दिया। 'एक प्यार का नगमा है', 'डफली वाले डफली बजा', 'मेरे दिल में आज क्या है', 'ओम शांति ओम' और 'एक दो तीन' जैसे गाने आज भी पसंद किए जाते हैं।

दोनों की जोड़ी ने करीब 35 साल तक हिंदी सिनेमा में काम किया और सैकड़ों फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। उनके संगीत को कई बार फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इस जोड़ी ने कुल सात बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। लक्ष्मीकांत का निधन 25 मई 1998 को मुंबई में हुआ और वह 60 साल के थे।

--आईएएनएस

पीके/पीएम

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